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ब्याज दरों को घटाना ही मंदी का समाधन

द्वारा : ashwanimahajan    

लेखक : Ashwani Mahajan
ब्याज दरों को घटाना ही मंदी का समाधन
 इस बार पिछले 15 वर्षों में किसी तिमाही (तीन मासद्ध में पहली बार औद्योगिक उत्पादन
घटने का अनुमान है। इसे सीध-सीध अमरीका से प्रारम्भ हुई वैश्विक मंदी से जोड़ कर देखा जा रहा है। स्वभाविक ही है कि किसी भी देश में उत्पादन का एक हिस्सा निर्यात के लिए होता है। विश्व स्तर पर घटते उत्पादन और रोजगार का असर हमारे निर्यातों पर होना स्वभाविक ही है। ऐसे में निर्यात हेतु होने वाले उत्पादन में कमी आई है, जो हमारे कुल उत्पादन में कमी के रूप में परिलक्षित हो रही है। उध्र अमरीका की सबसे बड़ी आटो कंपनी जनरल मोटर्स सहित सभी कंपनियों ने अपना उत्पादन कापफी घटा दिया है और वे बंद होने के कगार पर खड़ी हैं। इसलिये उनके द्वारा भारत से कल-पुजोZं की मांग पर असर पड़ रहा है। उध्र अमरीकियों की घटती आमदनी भारत से आउटसोर्सिंग पर भी प्रभाव डाल सकती है। यानि जहाँ-जहाँ विदेशी आर्थिक संबंध् हैं वहीं आर्थिक गतिवििध्यां प्रभावित होने की आशंका है।
 ऐसे स्थिति में देश में आर्थिक गतिवििध्यों के ध्ीमेपन को थामने हेतु पहले भारतीय रिजर्व बैंक और बाद में सरकार ने कुछ नीतिगत उपाय किये हैं। रेपो रेट में कटौती करके उसे 6.5 प्रतिशत तक कर दिया गया है। उसी प्रकार नकद रक्षित अनुपात (सी आर आरद्ध में पिछले 2 माह में 3.5 प्रतिशत की कटौती की गई है। वैधनिक तरलता अनुपात (एस.एल.आर.द्ध को भी एक प्रतिशत से कम किया गया है। इन सभी प्रयासों से लगभग तीन लाख करोड़ रुपये की तरलता बैंकिंग व्यवस्था के पास बढ़ा दी गई है। उध्र सरकार ने राजकोषीय नीति में भारी बदलाव करते हुए न केवल 20,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च का प्रावधन किया है, निजी सार्वजनिक साझेदारी (पी.पी.पी.द्ध को बढ़ावा देते हुए 10,000 करोड़ रुपये का प्रावधन ढांचागत पुनर्वित्त निगम हेतु किया गया है। अनुमान है कि इसके द्वारा 1 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश निजी-सार्वजनिक प्रकल्पों में किया जा सकेगा। साथ ही साथ निर्यात संबं(Zन हेतु निर्यातकों को )ण सुविध, कृषि हेतु बैंकों और नाबार्ड को पुनर्वित्त के लिये कुल 10,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त प्रावधन, सरकारी विभागों के पुराने वाहनों को बदलने हेतु अनुमति इत्यादि ऐसे कुछ उपाय अपनाये गये हैं जिससे अर्थ व्यवस्था में मांग बढ़ाई जा सकेगी।
 हमें यह समझना होगा कि यह मंदी भारत की नहीं है, बल्कि अमरीका की है।  इसलिये आवश्यकता इस बात की है कि मंदी से प्रभावित क्षेत्राों को मदद पहुंचे और आम लोगों को इस मानसिकता से उबारा जाये। पिछले कुछ समय से ब्याज दरों के बढ़ने के कारण घरों की नई मांग नहीं आ रही है। इसका कारण है कि घरों की बढ़ी कीमतों और ब्याज दरों में वृि( के चलते मध्यम वर्ग के लिए उनकी ई.एम.आई. उसकी जेब की पहुंच से बाहर हो रही है। इसी कारण से उपभोक्ता वस्तुयें जैसे कारें, इलैक्ट्रानिक्स का सामान इत्यादि भी उनकी )ण क्षमता से बाहर होता जा रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा भारी मात्राा में विदेशी मुद्रा बाहर ले जाने के कारण बैंकों के पास तरलता लगातार घटती जा रही थी, जिसके कारण बैंक न केवल )ण ऊँची ब्याज पर दे रहे थे, बल्कि )ण देने में हाथ भी खींच रहे थे। हमें समझना हमें समझना होगा कि रियल इस्टेट के क्षेत्रा में मंदी का अमरीकी मंदी से कुछ लेना देना नहीं है। लेकिन पिफर भी इस क्षेत्रा को उबारना देश के लिये जरूरी है। उध्र ढांचागत निवेश में कुछ शिथिलता आने के कारण भी अर्थव्यवस्था में ध्ीमापन आया है। इसका भी संबंध् अमरीकी मंदी से नहीं है।
 लेकिन कुछ क्षेत्राों में जहां अमरीकी मंदी का असर है वे हैं लोहा-इस्पात उद्योग, आटो उद्योग, आउट सोर्सिंग उद्योग इत्यादि। अर्थव्यवस्थाओं में बदलाव आते ही रहते हैं। कुछ क्षेत्रा अिध्क बढ़ते हैं और कुछ में गिरावट आती है। नये-नये क्षेत्राों का विकास भी होता ही रहता है। मंदी वास्तव में उत्पादन घटने से कम बल्कि लोगों की भविष्य के बारे में आशंकाओं के कारण ज्यादा बढ़ती है। लोगों को जब लगने लगता है कि उत्पादन घटेगा, कीमतें घटेंगी और नौकरियां भी घटेंगी तो वे घबराकर मंदी की मानसिकता में चले जाते हैं। अपनी मांग को स्थगित कर देते हैं और अर्थ व्यवस्था रसातल में जाने लगती है। इसलिये मंदी की मानसिकता में नहीं जाने देना, यह नीति निर्माताओं के लिये चुनौती होती है।
 घरों की मांग कापफी समय से स्थगित रही है। इसलिये ब्याज दरों में कटौती करते हुये घरों की मांग को बढ़ाना समय की आवश्यकता है। रिजर्व बैंक ने पिछले लगभग 3 माह में तरलता (लििक्वडिटीद्ध को बढ़ाने हेतु महत्वपूर्ण प्रयास किये हैं। लेकिन उसके बावजूद अभी तक कुछ बैंकों द्वारा ब्याज दर में हल्की सी कमी के अपवाद को यदि छोड़ दें तो पाते हैं कि बैंकिंग सैक्टर ने अपनी उधर की दरों को घटाया नहीं है। रिजर्व बैंक के निर्देशों के बावजूद बैंक किसी न किसी बहाने से ब्याज दरों में कटौती को टालते जा रहे हैं। सरकार और रिजर्व बैंक ब्याज दरों को जल्द घटाने हेतु बैंकों पर दबाव बनाये, यह समय की जरूरत है। ब्याज दरों में कमी घरों और निवेश मांग के लिये )णों को बढ़ाने के लिये तो जरूरी ही है। यह इसलिये भी जरूरी है कि ब्याज दरों में कटौती की आशा में लोगों ने अपनी मांग को स्थगित करके रखा है। इसमें होने वाली एक-एक दिन की देरी अर्थव्यवस्था को और अिध्क मंद कर सकती है जिससे उसे वापिस उबारना ज्यादा कठिन काम होगा। 
प्रकाशन तिथि: मई 13, 2009
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