पुस्तक का नाम: रास्ता छोडो डार्लिग लेखक/संपादक: क्षमा
शर्मा
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नईदिल्ली-110002
मूल्य: 450
समीक्षक: डा. दया दीक्षित
सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कथाकार क्षमा शर्मा के नए कथा संग्रह
रास्ता छोडो डार्लिग में जिंदगी, समाज और संसार तथा सांसारिकता के अंतर्सबंधों के कई पक्षों, रंगों और विद्रूपों का अंकन है।
कुछ कहानियों में लेखिका की प्रखर, मुखर रैडिकल सोच उभरकर आई है और पंथियों की खबर ली गई, जो चेग्वारा, मार्क्स तथा कास्त्रो के नाम या विचारों की जुगाली करते हुए चूहों की तरह समाज और व्यवस्था को कुतरकर खोखला कर रहे हैं तो कुछ में राजनीति की नूराकुश्ती और हिटलरी हैवानियत के आगे रोती सिसकती इंसानियत का मंजर है।
धारदार
व्यंग्यात्मक कहानियां दूरदर्शन की लाइव टेलीकास्टिंग और येन केन प्रकारेण टी.आर.पी. को बढाने वाले कार्यक्रमों की पोलपट्टी को बडे व्यंग्यपूर्वक बांचती हैं फिर भले ही ये कार्यक्रम लडकी/भ्रूण मारने के नायाब तरीके दिखाने से क्यों न जुडे हों। बालमन के मनोविज्ञान, उनके भय, लडका-लडकी में भेद, किशोरावस्था के तनाव तथा आक्रोश को व्यंजित करने में बेजोड कहानियों के साथ ही कुछ कथाएं जीवन के चौथेपन के सुख-दुखों को उनके विकल्पों को ढूंढती हैं। शिक्षा, शिक्षण के प्रारंभिक से लेकर यूनिवर्सिटी स्तर तक के
बहुविध चित्र हैं संग्रह में। अफसरी शोषण के कई किस्से हैं।
क्षमा शर्मा की कहानियों का विषय वैविध्य चकित कर देता है, इनमें कहीं पति का अहं तो कहीं सौतेली मां का अप्रत्याशित सद्भाव, कहीं लिव-इन रिलेशनशिप की संगति-विसंगति, कहीं पडोसियों का मोर्चा तो कहीं बांकेबिहारी दरबार का सत्यांकन, साम्प्रदायिकता के बीच सौमनस्य जगाती बहुविध कथाओं से पूर्ण होता है यह कथा संग्रह। रास्ता छोडो डार्लिग उस प्रतीक वृत्ति का कथावृत्त है, जो आज हर कहीं, प्रत्येक जगह पर काबिज है- अंधेरा कायम रहे का उद्घोष करती हुई। बेहद महत्वपूर्ण और दिलचस्प है यह कथा और यह संकलन भी।