आमतौर पर फाँस शब्द का इस्तेमाल ज्यादातर बुरे या नकारात्मक नज़रिए से ही होता है लेकिन इस किताब ने वाकई जैसे 'फाँस शब्द के
मायने बदल दिए। संपादक राज केसरवानी लघुकथा संग्रह 'फाँस' में ग्यारह कथाकारों की चुनिंदा लघुकथाओं को पुस्तककार करने में बखूबी कामयाब हुए हैं।
फटाफट फूड के युग में तुरत-फुरत खत्म हो जाने वाली लघुकथाएँ व्यवहारिक और पठनीय लगती है। ये 'मिनी-कहानियाँ' भले ही पलों में पढ़कर खत्म हो जाती हैं मगर ये देर तक गहरा असर छोड़ जाती हैं जो लेखक-संपादक की कामयाबी है। पुस्तक की शुरुआत में हिन्दी लघुकथा का सिंहावलोकन भी दिया है जो लघु कहानियों के इतिहास का लेखाजोखा पेश करता है।
कुल मिलाकर संग्रह को संग्रहणीय की श्रेणी में रखा जा सकता है।