''असली भूत...देखिए रात 9बजे...सिर्फ इसी चैनल पर...''
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प्रकाशन तिथि: दिसम्बर 16, 2007
कुछ प्रापर्टी डीलरों से पैसा लेकर हमारे एक दोस्त ने एक ''न्यूज़ चैनल'' खोला है। सोचा बिजनिस में नया हाथ मारेगें। पूंजी कम थी सो सुनसान इलाके में दफ्तर खोलना पड़ा। दोस्त ने बताया कि एक दिन रात को लाईव था। एंकर सवाल करती गई। कैमरे की तरफ से मेंढ़क और झिंगुर की आवाज़ें आतीं रहीं। रिपोर्टर सेट पर नहीं पहुंचा था। एंकर को टाॅक बैक ठीक से नहीं मिल रहा था। उसे लगा आडियो चैनल वन पर एंबिएंस आ रहा रहा है तो चैनल टू पर रिपोर्टर की भी कुछ ना कुछ आवाज़ आ ही रही होगी। इसी गफलत में सब कुछ चलता है। ब्लैक फ्रेम दिखता रहा।
उस हफ्ते की टीआरपी ने दोस्त की आंखे खोल दी। उस रिपोर्टर-रहित लाईव ओबी के दौरान दोस्त के चैनल की टीआरपी 55 पार थी।
दोस्त ने उस रिपोर्टर को कहा कुछ करने की ज़रुरत नहीं। सुनसान-श्मशानी इलाकों में घूमते रहो। जब तक कुछ ना दिखे तब तक रिपोर्ट फाईल करते रहो। भूतों की ऐशगाह। चुड़ैलों का डेरा। बिजिनेस चल निकाला। एक दोस्त ने शुरु किया तो बाकी भी पीछे हो लिए।
कंपिटीशन तो अभी ही इतना हो गया है कि दोस्त के भूत को दूसरे चैनल वाले ले उड़ रहे हैं। लाईनअप हमारे दोस्त का होता है पर कैमरा किसी और का पहुंच जाता है। एक रिपोर्टर को तो हमारे दोस्त ने भूत की स्टोरी का ट्रांसफर दूसरे चैनल के कैमरापर्सन को देते हुए पकड़ा। निकाल दिया। आजकल तो हमारा दोस्त अलसुबह ही ओबी वैन निकाल देता है। रिपोर्टरों से कहता है जाओ भूत ढ़ूंढों। लाईव करेगें।
हमारा दोस्त तो अपने चैनल के लिए अपना पैनल तैयार कर रहा है। किस तरह के भूत पर किस तरह की मशानी शक्ति काम करेगी। कौन सी चुड़ैल किस जोगन से भागेगी। रिसर्च चल रहा है। और भागना दिखाना है तो पहले बुलाना पड़ेगा। पहले एक अच्छे गेस्ट के लिए मारामारी-मगज़मारी होती थी। अब अच्छी चुड़ैलों के लिए होगी। वो दिन दूर नहीं जब एक ही चु़ड़ैल आपको अलग अलग कोट पहने कई स्टुडियो में दिखाई पड़ेगी।