ख़ुराक
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प्रकाशन तिथि: दिसम्बर 16, 2007
संतलाल से मेरा थोड़ा परिचय जरूर था पर मित्रता नहीं। परिचय का कारण था एक ही डिपार्टमेंट में काम करना.
एक दिन संतलाल ट्रांसफर होकर मेरे ही ऑफिस में आ गया। लंच के दौरान एक दिन यूँ ही गपशप चल रही थी। लोग अपनी-अपनी ख़ुराक के बारे में बता रहे थे कि संतलाल कहने लगा, ''''लोग पता नहीं कैसे इतना खा जाते हैं। मेरी ख़ुराक तो बहुत कम है। एक बार में दो रोटी से ज्यादा नहीं खाता। हर से हद तीन रोटी।`` हमारे एक सहयोगी कृष्ण कुमार कहने लगे, ''''संतलाल तभी तो इतने दुबले-पतले हो।``
मैं चुपचाप सारी बातें सुन रहा था। जब मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने कहा, ''''संतलाल उस दिन गाँव में मेरे घर आए थे तो अकेले ने तीन बार आटा गुँधवा दिया था। बीस से उपर पराँठे खा गए थे।`` पास बैठे कृष्ण कुमार ने कहा ''''नहीं वर्मा जी मुझे तो विश्वास नहीं होता कि संतलाल बीस पराँठे खा सकता है।`` संतलाल ने भी कुटिल मुस्कान बिखरते हुए कहा, ''''ओए वर्मा, क्यों मुझे मुफ्त़ में बदनाम करने पर तुला है? मैं कभी तेरे घर गया ही नहीं फिर खाना वैफसे खाता? हाँ मेरी ख़ुराक देखनी है तो किसी दिन चलता हूँ तेरे घर। इन सब भाइयों को भी ले चलते हैं। बोल कब चलें?``