प्रेयसी को पत्र
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प्रकाशन तिथि: सितम्बर 23, 2007
प्रिये, तुम्हें खत लिखने की सोचते सोचते पूरी ऋतु गुजर गई। ग्रीष्म ऋतु में बिजली की कमी के कारण तुम भी किसी कोने में पसीना बहा रही होगी यही सोचकर तुम्हें छेड़ने का मेरा मन नहीं हुआ। बिजलीघर तो जैसा तुम्हारा वैसा हमारा।
मनोहरे, बाहर बरसात हो रही है। कोई कवि होता तो ऐसे में मिलने की बात जरूर कहता। जानता है ऐसे में आ जाओगी तो जाओगी बारिश बंद होने पर ही। देर तक सानिध्य रहेगा। लेकिन मैं डरता हूँ। वैसे भी जेब में पैसे न हों तो आदमी जल्दी बोर होने लगता है। ऐसे में प्रेमिका पास हो तो हासिल में बेइज्जती के अलावा कुछ बचता नहीं है।
होने की जरूरत नहीं है। तुम अगर पुलिस के पास हो तो सारा हिंदुस्तान तुम्हारे पास है।
ललिते, वैसे तो मैं खत में मोबाइल नंबर लिख देता, तुम्हें बात करने में आसानी रहती। लेकिन सुरक्षा के लिहाज से ठीक नहीं है। आती बारी में अपना लिख भेजना।
चंद्रमुखी, तुम क्यों चिंता करती हो। आ भी जाओ। अगर कोई काम नहीं मिलेगा तो दलाली करने लगूंगा। हमारी सभ्यता ने इस काम को भी सम्मान दिला दिया है। दो लोगों को धोखे में रखकर कितना भी पैसा कमाया जा सकता है।
सुभगे, कल तुम्हें बाजार में देखा। जान पड़ा कि तुम्हीं हो। हांलाकि कल्पना से मैच नहीं करतीं लेकिन पहनावे से अच्छे घर की जान पड़ती हो। मैंने सोचा तुम्हीं ठीक हो। शाम तक मेरी बेपनाह मुहव्वत मुझ पर हावी हो गई। अब नये ढंग से मैं तुमसे नया प्रेम करने लगा हूँ। कल्पनावाली की मैंने छुट्टी कर दी है।
शकुंतले, दुष्यंत की तरह मैं तुम्हें नहीं भूलूंगा। मेरे पास एक ही अंगूठी है, उसे मैं तुम्हें दे दूंगा। उसकी चिंता रहेगी तो तुम्हारी भी याद रहेगी। पुरुष स्त्री को जो दे देता है उसके लिए भी उसे याद रखता है।
सखि, अब कितना लिखूं? इतना तो मैंने पूरे परीक्षा काल में भी नहीं लिखा। संक्षेप में मेरी स्थिति जो है सो लिखता हूँ। इसी से समझ लेना।
मुझे गरज किसी से क्या वास्ता मुझे काम अपने काम से।
तेरे जिक्र से तेरी फिक्र से तेरी याद से तेरे नाम से।
मानिनी, पता नहीं तुम लड़कियों को इतना घमंड किस बात का होता है। तुमने एक भी खत का जबाब नहीं दिया। कोई लड़का भी तुम्हारे आसपास नहीं दिखता। पता नहीं किन सपनों में खोई रहती हो। उस दिन भीड़ में धक्का दिया, तुमने ध्यान नहीं दिया। सीटी बजाने पर मुड़ कर भी नहीं देखा। क्या तुम्हारा स्वभाव भी पांच साल में एक बार मुड़कर देखने वाला है?
रूपा, मेरा अब यह आखिरी खत है। अब और नहीं। पाकिस्तानी जनता की तरह डेमोक्रेसी का इंतजार अनंतकाल तक मैं नहीं कर सकता। उधर नेपाल में भी जनता को सरकार मिल गई है। सोचता हूं अब मुझे भी अपने लिए कोई ठीक करनी ही पड़ेगी।
सजनि, तुम्हारा जबाब पाकर खुश हुआ। हिंदी जरूर तुम्हारी खराब है लेकिन उसकी चिंता तो किसी को भी नहीं है। हमीं क्यों नाहक परेशान हों?
काम्या, तुमसे मिलकर आया तो दिनभर खुश रहा। पर देखना हमारे मिलन का हाल मुशर्रफ-बेनजीर सा न हो। मुलाकात के समय कुछ और अपनी जगह पर कुछ और। हमारे तुम्हारे बीच मौकापरस्त नवाज शरीफ हो सकते हैं।
मेरी सरकार, मुझे तुम्हारा प्रधानमंत्री होने में कोई बुराई नजर नहीं आती। पद तो मेरा है। भाषण और प्रोग्राम तुम्हारे चलेंगे। बस लेफ्ट फ्रंट की तरह लेफ्ट मत हो जाना। वैसे वे भी जल्दी मान जाते हैं।
निर्मोहिणी, तुम क्यों रूठ गईं? मैंने तुम्हारे पिता को कब बुरा भला कहा था? मैं तो अपने प्रिंसीपल की शिकायत कर रहा था। कसम से एक बार भी जो पढ़ाई छोड़ने के बाद उसने किताब उठाई है। खुद अब तक जैसे का तैसा है और हमें जाने क्या समझता है!
प्रेयसि, फिल्मी लेखक की तरह चोरी की कहानी को अपना कहने लगा हूँ। निर्देशक की तरह उसे आजमाने में लगा हूँ। एक दोस्त की प्रेमिका से मिलने लगा हूँ। वह भी बोर है। जान पड़ता है प्रेम हो ही जायेगा। लेखक प्रेम कहानियां लिख लिख कर बोर नहीं होते। हम लोग प्रेम कर करके। सोचा तुम्हें बता दूँ।
सांवरी, फेयर क्रीम लगा कर साफ रहना। अपने नये प्रेमी का वजन कम करती रहना। उसे अपने अनुभवों को बताना। साफ साफ बताना, अखबारी संवाददाता की तरह अपने कम ज्ञान पर भी पूरा भरोसा रखना। स्वास्थ्य का ध्यान रखना, साथ वाले का भी। जितना सहन कर सके उसे उतना ही दुख देना।