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Haye!..Muz jaise bhanvare ko...
लेखक
: amba
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हाय! मुझ जैसे भंवरे को.....
कभी न कभी यह तो होना ही था....
मेरी आखों के सामने से अंधेरे को ह्ट्ना ही
था....
लेकिन मुझे क्या मालुम कि,
यह अंधेरा तुमने ही बन कर आना था!
किसी ने तो मुझे धोखा देना ही था....
हंमेशा कहते थे मेरे यार-दोस्त कि...
हसीनाओ पर आंखे मूंद कर विश्वास करते हो तुम...
जहां काली-घटाएं देखी...उलझ जाते हो बेकाबू हो कर् तुम....
गोलाइयां देख कर घुमने लगती है तुम्हारी आंखें....
चोंच पकड्ने के चक्कर में रहतेको, हो तुम....
हसीनाओं के अंग अंग पर हक जमाने को,
अपनी 'शान' समझते हो तुम...
...हम भी यारों का कहा हंसी में उडाया करते थे कभी...
आदत से मजबूर हो कर....
हसीनों का पीछा करते थे जभी-तभी....
कोई मान भी जाती थी तो हाथ थाम लेते थे हम....
किसी के मना करने पर,
जबर्दस्ती पर भी उतर आते थे हम.....
...लेकिन आज जो हुआ हमारे साथ क्या बताएं?
जबर्दस्ती हमने नहीं.... तुमने की है आज हमारे साथ!
हमें हम-सफर बना कर, खूंटे से बांध कर,
हमारा तमाशा बनाने की ठान ली है, तुमने आज....
आज फंस गए है... बुरी तरह से हम....
अब हसीनाओ को अलविदा कहने को मजबूर हुए है हम!
....तो तुमने आखिर धोखा दे ही दिया...
हाय! मुझ जैसे भंवरे को,
एक ही फूल पर मंडराने का हुक्म दे दिया!
प्रकाशन तिथि:
अक्तूबर 17, 2009
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