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Masti mein zumati hui....
मस्ती में झुमती हुई मस्ती में झुमती हुई
मस्ती में झुमती हुई, जा रही थी वो….
होठों पर कोई गीत मचल
रहा था।
अंगडाई लेती हुई जुल्फों की घटा को….
बार बार रोकने की कोशिश कर रही थी वो…..
आंखे थी मधुशाला की छबी लिए हुए,
उडता हुआ दुपट्टा भी अब दूर चला गया…..
‘हाय अल्ला’ कहती हुई दुपट्टे के पीछे अब भागी वो…..
मेरी कोई नहीं थी फिर भी जाने क्यों?
मुझे जाते जाते अपनेपन का झुठा एह्सास….
न जाने क्यों दे कर चली गई वो…..
जल्दबाजी में मुझसे ट्कराकर वो बेवफा,
प्रेम संदेशा मेरे नाजुक दिल के हवाले…
आखिर किसलिए कर के दफा हो गई वो…..
मस्ती का आलम मेरे भी अंदर मचल रहा था….
..गर बाहर निकल आता काश….
अब तक कली से फूल बन चुकी होती वो…..
ये तो अच्छा ही हुआ कि…..मस्ती में चली गई वो…..
प्रकाशन तिथि:
अगस्त 27, 2009
ambalika के द्वारा और अधिक संक्षेपण
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