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धुँधले-धुँधले अक्षरो, कुछ तो कहो

द्वारा : Mahendra Yadav    

लेखक : माणिक वर्मा
दिल में क्या है सरफिरो कुछ तो कहो
सर का सौदा मत करो, कुछ तो कहो।
आँख सूरज से मिलाते क्यों नहीं
रात के जादूगरो,
कुछ तो कहो
आदमी पर क्यों नहीं जादू चला
वक्त के पैगम्बरो, कुछ तो कहो।
किन चिरागों की नजर तुमको लगी
शाम से जलते घरो, कुछ तो कहो।
मेरे छूने से बने हो देवता
वरना क्या थे पत्थरो, कुछ तो कहो।
बाप को बेटी ने खत में क्या लिखा
धुँधले-धुँधले अक्षरो, कुछ तो कहो।
और कितने वस्त्र त्यागे रुपसी
रूप के सौदागरो, कुछ तो कहो।
आप तो कहते थे मंजिल आ गई
फिर लुटे क्यों रहबरो, कुछ तो कहो।
आँख क्या झपकी जरा तुम चल दिए
कब मिलोगे अवसरो, कुछ तो कहो-
- माणिक वर्मा
प्रकाशन तिथि: सितम्बर 16, 2007
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