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धुँधले-धुँधले अक्षरो, कुछ तो कहो

Review by : Mahendra Yadav
विजिट्स: 115
शब्द: 300
प्रकाशन तिथि: सितम्बर 16, 2007
दिल में क्या है सरफिरो कुछ तो कहो।

सर का सौदा मत करो, कुछ तो कहो।

आँख सूरज से मिलाते क्यों नहीं

रात के जादूगरो, कुछ तो कहो।

आदमी पर क्यों नहीं जादू चला

वक्त के पैगम्बरो, कुछ तो कहो।

किन चिरागों की नजर तुमको लगी

शाम से जलते घरो, कुछ तो कहो।

मेरे छूने से बने हो देवता

वरना क्या थे पत्थरो, कुछ तो कहो।

बाप को बेटी ने खत में क्या लिखा

धुँधले-धुँधले अक्षरो, कुछ तो कहो।

और कितने वस्त्र त्यागे रुपसी

रूप के सौदागरो, कुछ तो कहो।

आप तो कहते थे मंजिल आ गई

फिर लुटे क्यों रहबरो, कुछ तो कहो।

आँख क्या झपकी जरा तुम चल दिए

कब मिलोगे अवसरो, कुछ तो कहो-
- माणिक वर्मा
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