(Sooraj ke Naam)सूरज के नाम
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प्रकाशन तिथि: सितम्बर 16, 2007
जयवंती डिमरी का उपन्यास ''सुरजू के नाम'' में भूटान का वह दुर्गम प्रदेश है, जहाँ जीवन आसान नहीं है। एक मजदूर स्त्री के लिए तो और भी नहीं। वह भी, अप्रवासी स्त्री मजदूर के लिए तो कदापि नहीं।
इस उपन्यास में लेखिका ने एक ऐसी औरत के संघर्ष का वर्णन किया है, जो किसी नारीवाद की पैरवी न करता हुआ, सीधे दो-टूक शब्दों में मानवता को संबोधित है। यूँ तो सुकूरमनी दुनिया से जूझती एक माँ के रूप में दिखाई देती है, किंतु एक युवा एकाकी माँ आखिर एक औरत ही होती है और सहारा पाने के लिए किसी न किसी पुरुष की खोज करने लगती है। सहारा पाने की ललक उसे बार-बार छले जाने को विवश करती है।यह जानते हुए भी कि यही उसकी नियति है, वह अपने बेटे सुरजू के लिए खुली पलकों से सपने देखने में भी नहीं हिचकती।
सुकूरमनी के पात्र को उसकी चारित्रिक एवं परिवेशीय विशेषताओं के साथ प्रस्तुत करने के लिए लेखिका ने, उससे मिश्रित भाषा में संवाद कराए हैं, जिनमें हिन्दी, नेपाली, बोडो, भूटानी सभी के शब्द समाहित हैं।
प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया,नई दिल्ली