व्यंग पिछडे हुऐ होने का सुख contd ...part 2
Summary rating: 5 stars
2 समीक्षा
विजिट्स:
50
शब्द:
600
प्रकाशन तिथि: फरवरी 14, 2008
व्यंग पिछडे हुऐ होने का सुख contd ...part 2 विवेक रंजन श्रीवास्तव
सच तो यह है कि हर प्लातून में अग्रिम पंक्ति में तो मात्र तीन ही व्यक्ति होते हैं ! बाकी सब तो पिछडे हुये ही होते हैं ! मतलब बहुमत पिछडे हुओं का होता है , जो सरकारें बनाते हैं ! छक्का मारने के लिये बैक फुट पर खेलना जरुरी होता है ! मेरा सुझाव है कि पिछडेपन को बढ़ावा देने के लिये धीमी चाल प्रतियोगिता ,स्लो साइकलिंग रेस जैसी प्रतियोगिताओं को राष्र्टीय खेलों के रूप में मान्यता दी जानी चाहिये ! इसके लिये हमें एकजुट होकर आंदोलन करना चाहिये , रेल की पटरियां उखाड फेंकनी चाहिये , बसें जला देने से डरना नहीं चाहिये , पुलिस पर पत्थर बरसाने चाहिए ! ये ही वे खेल हैं जो पिछडेपन का महत्व प्रतिपादित करते हैं ! जो सबसे पीछे रहता है वह जीतता है ! कितना मजा आता है स्लो साइकलिंग,करते हुये लोग गिरते हैं ब्रेक लगा लगा कर आडा टेढ़ा चलते हैं ! जो सबसे पीछे रहता है उसके लिये तालियां बजती हैं ! अजगर करे न चाकरी , पंछी करे न काम , दास मलूका कह गये सबके दाता राम ! इन खेलों से हमारी युवा पीढ़ी पिछडेपन का महत्व समझ कर अंर्तराष्र्टीय स्तर पर भारत का नाम रोशन कर सकेगी ! दुनियां के विकसित देश हमसे प्रतिस्पर्धा करने की अपेक्छा अपने चेरिटी मिशन से हमें अनुदान देंगे ! बिना उपजाये ही हमें विदेशी अन्न खाने मिलेगा ! वसुधैव कुटुम्बकम् का हवाला देकर हम अन्य देशों के संसाधनों पर अपना अधिकार प्रदर्शित कर सकेंगे ! दुनिया हमसे डरेगी , क्योंकि नंगे से तो खुदा भी डरता है ! हम यू. एन. ओ. में सेंटर आफ अट्रेक्शन होंगे ! हमारे पिछडे हुये देश को ऊपर उठाने के लिये विश्वव्यापी चर्चायें होंगी ! कोई विकसित देश हमें गोद लेगा ! आपने अमरबेल देखी है ? यह जड रहित पर जीवी वनस्पती है ! पर है अमर ! यह अन्य वृछ जिस पर यह आश्रित होती है , उसका ही रस खींचकर जीवित रहती है ! इसे हमारी राष्र्टीय वनस्पती घोषित किया जाना चाहिये ! इसी तरह जोंक ,पिस्सू व खटमळ को उनके परजीवी होने के कारण विशेष महत्व दिया जाना चाहिये ! पिछडे हुये होने पर परजीवी जैसा सुख नसीब होता है ! आरक्छन की बैसाखियों पर , टैक्स देने वालों की कुर्सियों पर काबिज होने का असाधारण मजा लेना हो तो पिछडे ,दलित , पतित बनिये ! शायद यही कारण है कि आज हर कोई चारित्रिक स्तर पर नीचे गिरने के नये नये प्रतिमान बनाता नजर आ रहा है ! लोग अपनी ही नजरों में गिर रहे हैं ! मेरा अभिमत है कि समाज के प्रत्येक वर्ग को अनुसंधान कर स्वयं को सबसे ज्यादा पिछडा सिद्ध करने के लिये तथ्य जुटा कर ठीक चुनावों से पहले अभूतपूर्व आंदोलन कर दलित ,पतित , पिछडा , अनुसूचित , जनजातीय वगैरह घोषित करवा लेना चाहिये ! इससे न केवल इस जन्म में सुविधायें मिलेंगी , वरन अगला जन्म भी सफल होगा क्योंकि परमात्मा दीनबंधु होता है , दीन हीन , मलिन , अस्तित्वहीन , दर्प रहित बनकर तो देखिये ईश्वर स्वयं आयेंगे आपसे मिलने ! विवेक रंजन श्रीवास्तव