रोज़ा इस्लाम धर्म के पाँच स्तम्भों में से एक महान स्तम्भ है। यह सन् 2 हिज्री में अनिवार्य हुआ।
रोज़ा अल्लाह परम पर्मेश्वर
की
उपासना और आराधना का एक ऐसा ढंग है जिसे अल्लाह ने अपने लिए विशिष्ट किया है, क्योंकि यह एक गुप्त उपासना है जिस में ढोंग का समावेश नहीं होता है। इस का मूल उद्देश्य यह है कि मनुष्य के भीतर ईश भय उत्पन्न हो जाए। जिस प्रकार एक मुसलमान वृत रखने की अवस्था में अपने स्वामी के द्वारा निषिध की हुई चीज़ो से बचाव करता है, उसी प्रकार उसका पूर्ण जीवन व्यतीत हो। केवल इतना ही नहीं, अपितु इस्लामी वृत (
रोज़ा) के अनेक धार्मिक, सामाजिक, व्यवहारिक तथा स्वास्थ्य संबंधी लाभ हैं जो किसी अन्य धर्म में कल्पित भी नहीं। इसका रहस्य उसी को मिल सकता है जो वास्तव में इसका अनुभव कर चुका हो। इस पुस्तक में रोज़े से संबंधित समस्त अहकाम व मसाईल तथा रोज़ा, एतिकाफ, रोज़े की क़ज़ा एंव कफ्फारा तथा इन से संबंधित आधुनिक मसाईल पर 70 से अधिक फतावे उल्लिखित हैं।