Summarize Human Knowledge

.

.

आखिरी अढ़ाई दिन

द्वारा : Mahendra Yadav    

लेखक : मधुप शर्मा
मीना कुमारी:  नाम, इज्जत, शोहरत, काबिलियत, रुपया, पैसा सभी कुछ मिला पर, सच्चा प्यार नहीं।.....कई बार महीनों गुजर गये हैं
इस भरम में कि मैंने अपनी मंजिल पा ली।.... मिल गया मुझे जिसकी पिछली कई जिंदगियों से तलब थी....जिसे खोजती हुई भटक रही थी मेरी रूह को और मेरी निगाहों को हमेशा, हर पल.....पर वो कहते है न कि बहुत करीब से देखा जाय तो किसी चीज को, तो पूरी तरह देख नहीं पाते उसे....यही तो होता रहा है मेरे साथ भी।....मैं अपनी बेसब्री की आदत का शिकार होती जा रही हूँ।...जरा-सी कशिश महसूस करते ही मैं अपने आप पर काबू खो बैठती हूँ और बेतहाशा खिंचती चली जाती उसकी तरफ...इतनी करीब कि गैरियत और अलहदगी का अहसास ही मिट जाता.... पर जिंदगी में नजदीकियाँ होती हैं तो दूरियाँ भी बहुत दूर नहीं होतीं....मैंने जब भी किसी को अपने से अलहदा करके उसके वजूद में खुद को तलाशने की कोशिश की तो नाउम्मीदी ही हाथ लगी....सारे के सारे भरम खुलते चले गये....मेरी तो कोई जगह थी ही नहीं उसके आसपास....
मीना कुमारी ख़ूब पीती थीं। चाहती थीं कि वे आईने के सामने खड़े होकर भी अपने वजूद से इनकार हो जाएँ। काश ! ऐसा हो सकता। और जो हुआ वह बेहद ख़ौफ़नाक़, फफोले-भरा, ग़म में डूबा हुआ मटमैला सफ़हा था।
दरअसल मीना कुमारी की जिंदगी का फ़लसफ़ा अपनी तकदीर से बगावत का वह अफसाना था जो हर पल अपने जे़हन में सरफ़रोशी की तमन्ना पर फिदा था। मधुप भाई ने उन लम्हों को बेशक यादगार बना दिया है।
मीना कुमारी की जातीय ज़िंदगी के उजाले-अँधेरे पाख एक ऐसी औरत की तसवीर पेश करते हैं जो शमा बनी जीते-जी जलकर राख हो जाना चाहती थी। वह राख जिसमें दबी चिनगारी सदियों-सदियों तक अपनी ऊष्मा का एहसास कराती रहे और जताती रहे कि मैं मज़ार में पड़ी-पड़ी सुबकना नहीं छोड़ सकी। मैं उन हज़ारों-हज़ार अभागी नारियों में से ही एक हूँ, जिनका रेशा-रेशा ऐसा मज्जापूर्ण है कि जो अपने को मारकर भी आती-जाती साँसों के स्पंदित झूले में हिचकोले खाती रहती हैं परंतु उफ़ तक नहीं करतीं, न ही किसी से शिकवा-शिकायत। करतीं भी तो किससे ?
:
प्रकाशन तिथि: जून 29, 2008
कृपया इस सार का मूल्यांकन करें : 1 2 3 4 5

Bookmark & share this post

.