आंखे
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प्रकाशन तिथि: मार्च 09, 2007
आंखे
उसको मैंने पहली बार अपने आफिस में एक स्क्रीन पर देखा था में दावे से कह सकता हूं उससे सुन्दर महिला मैने पहले कभी नही देखी थी वो महिला थी या लड़की इस बार में मैं आश्वत नहीं हूं उसकी काली काली आंखों में एक खास चमक थी चहरे पर किसी तरह का कोई भाव नहीं था आंखे शून्य की तरह लग रही थी आंखे छोटी-छोटी थी पर यूं लगती थी जैसे किसी ने सुबह की ओस को पत्ते से उठाकर दर्पण पर रख दिया हो इतनी साफ कि आंखो में आंखो का ही अक्स देखा जा सकता था इतनी खूवसूरत.. की जान पड़ता था जैसे संगमरमर की खूवसूरती को नजर ना लगे इसलिए खुदा ने एक काला टीका लगाया हो... पलकें अधिक घनी नही थी लेकिन इस तरह खिली थी मानो किसी अनमोल चीज की रखवाली के लिए नुकीला भाला लिए सैनिक एक कतार में खड़े हो..एक बार लगा कि अगर किसी ने इसको बुरी नजरों से देखा तो ये सैनिक सीने में नस्तर उतार देंगे आंख के नीचे का रंग हल्का सा स्याह था जो उसके खूबसूरत चेहरे पर कुछ अलग लग रहा था लेकिन यह स्याह रंग ही उसकी वास्तविकता को असली जामा पहना रहा था अगर ये स्याह रंग नही होता तो शायद उसकी असलियत जानन आसान नहीं होता..जितनी खूबसूरत उसकी आंखे थी उतनी ही खूबसूरत पलके भी थी आंखो के उपर पलके यूं थी जैसे मानो किसी रानी के सिर पर मुकट रखा हो पलकों के उपर.....भोहें धनी नहीं थी भौंरे के जैसा ही उनका रंग स्याह काला रंग था लगता था जैसे स्याही की एक काली लाईन खींच दी गई हो..उसने अपने चेहरे को एक काली चुन्नी से ढक रखा था लेकिन चुन्नी से पीछे से उसके चेहरे का पूरा अक्स नजर आ रहा था मेरी जिज्ञासा काफी ज्यादा बढ़ चुकी थी इसलिए मैने सामने स्क्रीन पर नजर आ रहे चेहरे की आई डी को एक पोर्ट पर प्ले कियातो वोखूबसूरत लड़की (तरन्नुम)थी इसके बाद मुझे महाराष्ट सरकार पर बड़ा गुस्सा आया जिसने बार पर प्रतिबंध लगा कर लोगो को एक खूबसूरत चेहरा देखने से वंचित कर दिया.विजय संत