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दर्द-ए-ग़म

Summary rating: 4 stars 4 समीक्षा
लेखक : मीनाक्षी
Review by : Mahendra Yadav
विजिट्स: 256
शब्द: 300
प्रकाशन तिथि: मार्च 09, 2007
कभी जोड़ा था अपने दिल को मेरे दिल के तार से
बातें नहीं क्यों करते फिर मुझसे तुम प्यार से.

वो फूल जो मिले थे किताबों में ही कभी
बरसे थे क्या वो फूल बनके मौसमे-बहार से.

पढ़ते थे मेरे नग्मों को और गुनगुनाते थे कभी
बिसराया तरानों को क्यूं नफरत के वार से.
कैसे जिओगे ऐ दिल तनहाइयों में तुम
देखे बगैर रहते थे जिसे बेकरार से.
आप टूटे या न टूटे पर टूट चुका हूं मैं
टूटा है दिल भी बेशक एक तेरे इनकार से.भूले से भी कभी न ये दिल किसी को दूंगा
मुश्किल बड़ा है सहना जख्मे हज़ार से.
दर्द-ए-ग़म  द्वारा  मीनाक्षी     
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