भगवती लक्ष्मी
लक्ष्मी का अभिषेक दो हाथी करते हैं । वह कमल के आसन पर विराजमान है । कमल कोमलता का प्रतीक है ।लक्ष्मी के
एक मुख, चार हाथ हैं । वे एक लक्ष्य और चार प्रकृतियों (दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, श्रमशीलता एवं व्यवस्था शक्ति) के प्रतीक हैं । दो हाथों में कमल-सौन्दयर् और प्रामाणिकता के प्रतीक है । दान मुद्रा से उदारता तथा आशीर्वाद मुद्रा से अभय अनुग्रह का बोध होता है । वाहन-उलूक, निर्भीकता एवं रात्रि में अँधेरे में भी देखने की क्षमता का प्रतीक है ।
कोमलता और सुंदरता सुव्यवस्था में ही सन्निहित रहती है । कला भी इसी सत्प्रवृत्ति को कहते हैं । लक्ष्मी का एक नाम कमल भी है । इसी को संक्षेप में कला कहते हैं । वस्तुओं को, सम्पदाओं को सुनियोजित रीति से सद्दुश्य के लिए सदुपयोग करना, उसे परिश्रम एवं मनोयोग के साथ नीति और न्याय की मयार्दा में रहकर उपाजिर्त करना भी अथर्कला के अंतगर्त आता है । उपाजर्न अभिवधर्न में कुशल होना श्री तत्त्व के अनुग्रह का पूवार्ध है । उत्तरार्ध वह है जिसमें एक पाई का भी अपव्यय नहीं किया जाता । एक-एक पैसे को सदुद्देश्य के लिए ही खर्च किया जाता है ।
लक्ष्मी का जल-अभिषेक करने वाले दो गजराजों को परिश्रम और मनोयोग कहते हैं । उनका लक्ष्मी के साथ अविच्छिन्न संबंध है । यह युग्म जहाँ भी रहेगा, वहाँ वैभव की, श्रेय-सहयोग की कमी रहेगी ही नहीं । प्रतिभा के धनी पर सम्पन्नता और सफलता की वर्षा होती है और उन्हें उत्कर्ष के अवसर पग-पग पर उपलब्ध होते हैं ।
गायत्री के तत्त्वदशर्न एवं साधन क्रम की एक धारा लक्ष्मी है । इसका शिक्षण यह है कि अपने में उस कुशलता की, क्षमता की अभिवृद्धि की जाय, तो कहीं भी रहो, लक्ष्मी के अनुग्रह और अनुदान की कमी नहीं रहेगी । उसके अतिरिक्त गायत्री उपासना की एक धारा 'श्री' साधना है । उसके विधान अपनाने पर चेतना-केन्द्र में प्रसुप्त पड़ी हुई वे क्षमताएँ जागृत होती हैं, जिनके चुम्बकत्व से खिंचता हुआ धन-वैभव उपयुक्त मात्रा में सहज ही एकत्रित होता रहता है । एकत्रित होने पर बुद्धि की देवी सरस्वती उसे संचित नहीं रहने देती, वरन् परमाथर् प्रयोजनों में उसके सदुपयोग की प्रेरणा देती है ।