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टोपी शुक्ला ( भाग - २ )

द्वारा : SimanchalGouda    

लेखक : डॉ. राही मासूम रज़ा
टोपी शुक्ला ( भाग - १ ) से आगे  .......
टोपी ने दस अक्तूबर सन्    पैंतालीस को कसम खाई कि अब वह किसी ऐसे लड़के से दोस्ती
नहीं करेगा जिसका बाप ऐसी नौकरी करता हो ; जिसमें बदली होती रहती है। इसी दिन इफ़्फ़न के पिता की बदली मुरादाबाद हो गई । अब टोपी अकेला रह गया। नए कलेक्टर ठाकुर हरिनाम सिंह के तीनों लड़कों में से कोई उसका दोस्त न बन सका। डब्बू बहुत छोटा था , बिलू बहुत बड़ा था , गुड्‍डू केवल अंग्रेज़ी बोलता था। उनमें से किसी ने टोपी को अपने पास फटकने न दिया। माली और चपरासी टोपी को जानते थे। इसलिए वह बंगले में घुस गया । उस समय तीनों लड़के क्रिकेट खेल रहे थे। उनके साथ टोपी का झगड़ा हो गया। डब्बू ने अलसेसियन कुत्ते को टोपी के पीछे लगा दिया। टोपी के पेट में सात सूइयाँ लगीं तो उसे होश आया। फिर उसने कभी कलेक्टर के बंगले का रुख नहीं किया । घर में टोपी का दुख समझने वाला कोई न था। बस , घर की नौकरानी सीता उसका दुख समझती थी। जाड़ों के दिनों में मुन्नी बाबू और भैरव के लिए नया कोट आया। टोपी को मुन्नी बाबू का कोट मिला – कोट नया था ; पर था तो उतरन। टोपी ने वह कोट उसी वक्त नौकरानी के बेटे को दे दिया। वह खुश हो गया । टोपी को बिना कोट के जाड़ा सहन करने के लिए मज़बूर होना पड़ा। टोपी दादी से झगड़ पड़ा। दादी ने आसमान सिर पर उठा लिया। फिर माँ ने टॊपी की बहुत पिटाई की। टोपी दसवी कक्षा में पहुँच गया । वह दो साल फ़ेल हो गया था। उसे पढ़ने का उचित समय नहीं मिलता था। पिछली दर्ज़े की छात्रों के साथ बैठना उसे अच्छा नहीं लगता था। अब वह अपने घर के साथ-साथे स्कूल में भी अकेला हो गया था। मास्टर ने भी उस पर ध्यान देना बंद कर दिया। टोपी को भी शर्म आने लगी थी। जब उसके सहपाठी अब्दुल वहीद ने उस पर व्यंग्य बाण कसा तो उसे बहुत बुरा लगा।  उसने पास होने की कसम खाई । इसी बीच चुनाव आ गए। डॉ. भृगु नारायण चुनाव में खड़े हो गए, पर उनकी जमानत ज़ब्त हो गई। ऐसे वातावरण में टोपी का पास हो जाना ही काफ़ी था । इस पर भी दादी बोल उठी – “ तीसरी बार तीसरे दर्ज़े में पास हुए हो , भगवान नज़र से बचाए।
लेखक-परिचय :- ‘ राही मासूम रज़ा ’( जन्म-१९२७ ) एक सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं जिन्होंने अपनी कहानियों में ग्रामीण जीवन को बखूबी उकेरा है। अलीगढ़ युनिवर्सिटी से उर्दू साहित्य में पी.एच. डी. करने के बाद उन्होंने कुछ साल तक वहीं अध्यापन किया। फिर वे मुंबई चले गए जहाँ सैकड़ों फ़िल्मों की पटकथा , संवाद और गीत लिखे। प्रसिद्ध धारावाहिक ‘ महाभारत ’ की पटकथा और संवाद लेखन ने उन्हें इस क्षेत्र में सर्वाधिक ख्याति दिलाई। इनके पूरे लेखन में आम हिंदुस्तानी की पीड़ा में दुख-दर्द , उसकी संघर्ष क्षमता की अभिव्यक्ति है। राही ने जनता को बाँटने वाली शक्तियों , राजनीतिक दलों , व्यक्तियों , संस्थाओं का खुला विरोध किया। उन्होंने संकीर्णताओं और अंधविश्वासों , धर्म और राजनीति के स्वार्थी गठजोड़ आदि को भी बेनकाब किया। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – आधा गाँव , टोपी शुक्ला , हिम्मत जौनपुरा , कटरा बी आर्ज़ू , असंतोष के दिन , नीम का पेड़ ( सभी हिंदी उपन्यास ) ; मुहब्बत के सिवा ( उर्दू उपन्यास ) ,  मैं एक फेरी वाला ( कविता संग्रह ) , नया साल , मौजे गुल , मौज़े शबा , रक्से मैं , अज़नबी शहर : अज़नबी रास्ते ( सभी उर्दू कविता संग्रह ) , अठारह सौ सत्तावन ( हिंदी – उर्दू महाकाव्य ) , और छोटे आदमी की बड़ी कहानी ( जीवनी )। राही का निधन १५ मार्च १९९२ को हुआ।
प्रकाशन तिथि: अगस्त 10, 2009
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