‘ टोपी शुक्ला ’
प्रस्तुत ‘ कहानी ’ लेखक के एक उपन्यास का एक अंश है। कहानी टोपी के इर्द-गिर्द घूमती है। उसके पिता एक डॉक्टर हैं। उसका परिवार अत्यधिक संस्कारवादी है। घर में किसी वस्तु की कमी नहीं है। टोपी का एक दोस्त है – इफ़्फ़न। दोनों के घर अलग-अलग थे , दोनों के मज़हब अलग थे , दोनों एक-दूसरे कि बिना अधूरे थे। फिर भी दोनों में गहरी दोस्ती थी। दोनों में प्रेमे का रिश्ता था। दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। इफ़्फ़न के दादा और परदादा मौलवी थे। मरने से पहले उन्होंने वसीयत की थी कि उनकी लाश करबला ले जाई जाए। इफ़्फ़न कि पिता ने ऐसी कोई वसीयत नहीं की थी। उन्हें एक हिंदुस्तानी कब्रिस्तान में दफ़नाया गया। इफ़्फ़न की दादी नमाज़ और रोज़े की बड़ी पाबंद थी। वे पूरब की रहने वाली थी , इसलिए मरते दम तक पूरबी बोलती रही। वे गाने –बजाने में रुचि लेती थीं। इफ़्फ़न की छठी पर उन्होंने जी भर कर जश्न मनाया था। इफ़्फ़न की दादी ज़मीदार की बेटी थीं। उन्हें दूध-घी बहुत पसंद था , परंतु लखनऊ आकर वह इन सब चीज़ों के लिए तरस गईं। यहाँ आते ही उन्हें मौलवी बन जाना पड़ता था क्योंकि उनके पति हर समय मौलवी ही बने रहते थे। इफ़्फ़न की दादी को मरते वक्त अपना घर , आम का पेड़ और अनेक चीज़ें याद आईं। उन्हें बनारस के फ़ातमैन में दफ़न किया गया। इफ़्फ़न तब चौथी कक्षा में पढ़ता था और टोपी उसका दोस्त बन चुका था। वह अपनी दादी से बहुत प्रेम करता था। दादी उसे तरह-तरह की कहानियाँ सुनाती थीं। टोपी को दादी की भाषा बहुत अच्छी लगती थी। डॉक्टर भृगु नारायण नीले तेल वाले के घर में बीसवीं सदी प्रवेश कर चुकी थी यानी खाना मेज कुर्सी पर होने लगा था । टोपी को बैंगन का भुरता अच्छा लगा । वह बोला - “ अम्मी, ज़रा बैंगन का भुरता।” अम्मी शब्द सुनकर सभी टोपी को देखने लगे । टोपी की दादी सुभद्रा देवी ने कहा ’अम्मी’ शब्द इस घर में कैसे आया? टोपी ने उत्तर दिया – “ ई हम ईफ़्फ़न से सीखा है।” राम दुलारी बोली – “ तैं कउनो मियाँ के लड़का से दोस्ती कर लिहले बाय का रे?” इस पर सुभद्रा देवी गरज़ उठी। - “ बहू, तुमसे कितनी बार कहा है कि मेरे सामने यह गँवारों की जवान न बिला करो।“ लड़ाई का मोरचा बदल गया। जब भृगु नारायण को पता चला कि टोपी ने कलेक्टर साहब के लड़के से दोस्ती कर ली है तो वे अपना गुस्सा पी गए। इसके बाद टॊपी को बहुत मार पड़ी । फिर भी टोपी ने इफ़्फ़न के घर न जाने की हाँ नहीं भरी। मुन्नी बाबू और भैरव उसकी कुटाई का तमाशा देखते रहे। मुन्नी बाबू ने टोपी की शिकायत करते हुए कहा कि ये उस दिन कवाब खा रहा था। यह बात सरासर ग़लत थी ; जबकि मुन्नी बाबू स्वयं कवाब खा रहे थे। यह बात टोपी ने इफ़्फ़न से कही और दोनों जुगरफ़िया का घंटा छोड़कर सरक गए। उन्होंने पंचम की दुकान से केले खरीदे । टोपी केवल फल खाता था। टोपी ने कहना शुरु किया कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम अपनी दादी बदल लें , पर यह बात इफ़्फ़न को अच्छी नहीं लगी। इफ़्फ़न ने कहा – “ मेरी दादी कहती है कि बूढ़े लोग मर जाते हैं । इतने में नौकर ने आकर सूचना दी कि इफ़्फ़न की दादी मर गई हैं। शाम को जब टोपी इफ़्फ़न घर गया तो वहाँ सन्नाटा पसरा पड़ा था। वहाँ लोगों की भीड़ा जमा थी। टोपी के लिए मानो सार घर खाली हो चुका था। टोपी ने इफ़्फ़न से कहा – “ तोरी दादी का ज़गह हमरी दादी मर गई होती तब ठीक भया होता ।