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कीचड़ का काव्य

द्वारा : SimanchalGouda    

लेखक : काका कालेलकर

   
‘ कीचड़ का काव्य ’
 

इस ललित निबंध ‘ कीचड़ का काव्य ’ में काका ने कीचड़ की उपयोगिता का काव्यात्मक शैली में बखान किया है। काका कहते हैं कि हमें कीचड़ के गंदेपन पर नहीं , अपितु उसकी मानव और पशुओं तक के जीवन में उपयोगिता पर ध्यान देना चाहिए। उत्तर-पूर्वी राज्यों में सबसे ज़्यादा पैदा होने वाली फ़सल कीचड़ में ही उगती है। कीचड़ न होता तो क्या-क्या न होता , मानव और पशु किन नियामतों से वंचित रह जाते , इस निबंध से इस बात का पता चलता है। कीचड़ नफ़रत करने की वस्तु नहीं है, श्रद्धा करने योग्य है।
आज सुबह पूर्व में कुछ खास आकर्षण नहीं था। रंग की सारी शोभा उत्तर में जमी थी। उस दिशा में तो लाल रंग ने कमाल कर दिया था। परंतु बहुत ही थोड़े समय के लिए। देखते-देखते वहाँ के बादल श्वेत पूनी जैसे हो गए और यथाक्रम दिन का आरंभ हो गया।
हम आकाश का वर्णन करते हैं,पृथ्वी का वर्णन करते हैं, जलाशयों का वर्णन करते हैं। पर कीचड़ का वर्णन कभी किसी ने किया है? कीचड़ में पैर ड़ालना कोई पसंद नहीं करता , कीचड़ से शरीर गंदा होता है , कपड़े मैले हो जाते हैं। अपने शरीर पर कीचड़ उड़े़, यह किसी को भी अच्छा नहीं लगता और इसीलिए कीचड़ के लिए किसी की सहानुभूति नहीं होती।
अगर निष्पक्ष होकर सोचें तो कीचड़ में भी कम सौन्दर्य नहीं है। पहले तो यह कि कीचड़ का रंग बहुत सुन्दर है। 
हम सब कीचड़ के जैसे रंग पसंद करते हैं।
कलाभिज्ञ लोगों को भट्टी में पकाए हुए मिट्टी के बर्तनों के लिए यही रंग पसंद है।
फोटो लेते समय भी यदि उसमें कीचड़ का, एकाध ठीकरे का रंग आ जाए तो उसे वार्मटोन कहकर विज्ञ लोग खुश-खुश हो जाते हैं।
नदी के किनारे जब कीचड़ सूखकर उसके टुकड़े हो जाते हैं, तब वे कितने सुन्दर हो जाते हैं। नदी किनारे मीलों तक जब समतल और एक-सा फैला हुआ कीच़ड़ होता है, तब वह दृश्य कुछ कम खूबसूरत नहीं होता।
ज़्यादा गरमी से जब उन्हीं टुकड़ो में दरारें पड़ती हैं और वे टेढ़े हो जाते हैं, तब सुखाए हुए खोपरे जैसे दीख पड़ते हैं।
इस कीचड़ का पॄष्ठ भाग सूख जाने पर उस पर बगुले और अन्य छोटे-बड़े पक्षी चलते हैं, तब तीन नाखून आगे और अँगूठा पीछे ऐसे अनेक पद चिह्न अंकित हो जाते हैं।पशुओं के पदचिह्न की शोभा तो निराली है। 
फिर जब दो मदमस्त पाड़े अपने सींगों से कीचड़ को रौंदकर आपस में ल़ड़ते हैं तो उनके पैरों और सींगों के निशान से महिषकुल के भारतीय युद्ध का इतिहास ही लिखा हुआ जान पड़ता है।
मही नदी के किनारे आगे जहाँ तक नज़र जाती है वहाँ तक सर्वत्र सनातन कीचड़ ही देखने को मिलेगा। इस कीचड़ में हाथी क्या पूरा पहाड़ भी धँस सकता है।
हमारा अन्न कीचड़ से ही पैदा होता है, यह बात अगर सब समझ सकते तो कभी कोई कीचड़ का तिरस्कार न करता। पंक शब्द घृणास्पद लगता है,जबकि पंकज शब्द सुनते ही कवि लोग डोलने और गाने लगते हैं। मल बिल्कुल मलिन माना जाता है किंतु कमल शब्द सुनते ही मन प्रसन्न हो जाता है।
कवियों की ऐसी युक्तिशून्य वृत्ति उनके सामने रखें तो वे कहेंगे कि “ आप वासुदेव की पूजा करते हैं इसलिए वसुदेव को तो नहीं पूजते , हीरे का भारी मूल्य देते हैं किन्तु कोयले या पत्थर का नहीं देते और मोती को कंठ में बाँधकर फिरते हैं किन्तु उसकी माता सीप को गले में नहीं बाँधते।


प्रकाशन तिथि: अगस्त 07, 2009
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