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'उजाले की परछाई'

द्वारा : SThap    

लेखक : दिनकर जोशी

इस पुस्तक में दो गाँधी आमने-सामने हैं। अब आप यह न सोच लें कि यह राहुल गांधी और वरुण गांधी

की कहानी है। असल में यह किताब राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और उनके विद्रोही पुत्र हरिलाल के बारे में है।
बापू और हरिलाल दोनों अपनी अपनी जगह सही थे लेकिन परिस्थितियाँ कुछ इस तरह बिगड़ी कि एक सुयोग्य पुत्र के मन में पिता के आदर्शों के प्रति नफरत का विष भर गया और इसी आक्रोश ने हरिलाल को पतन की राह पर धकेल दिया।
हरिलाल अपने पिता का बेहद सम्मान करता था । वह भी अपने बापू की तरह देशसेवा करना चाहता था लेकिन उससे पहले वह विलायत जाकर बेरिस्टर बनना चाहता था। बापू के मित्र डॉ. मेहता उसकी विलायत शिक्षा का खर्च उठाने को भी तैयार हो जाते हैं लेकिन बापू इस पेशकश को यह कहकर ठुकरा देते हैं कि मेरी सेवा के बदले मेरे परिवार को लाभ नहीं मिलना चाहिए। हरिलाल को लगता था कि वह एक महान पिता की संतान होने का दंड भुगत रहा है।
यूं तो पुस्तक के केंद्र में बापू और हरिलाल हैं लेकिन इस सबके बीच 'बा' भी है जो पति और पुत्र के बीच पनपती कड़वाहट में पिसती रहती हैं। हरिलाल की मासूम पत्नी गुलाब, जो पति को बर्बाद होते देखती ही रह जाती है और एक दिन खत्म हो जाती है।
'उजाले की परछाई' के द्वारा लेखक बताना चाहता है कि बापू वो उजाला थे जिसे पूरी दुनिया अपना आदर्श मानती थी। हरिलाल अपने महान पिता से अलग अपनी पहचान तलाशता रहा, पर 'उजाले' के सामने सदैव 'वह परछाई' ही बना रहा।
इस पुस्तक में दो गाँधी आमने-सामने हैं। अब आप यह न सोच लें  कि यह राहुल गांधी और वरुण गांधी की कहानी है। असल में यह किताब राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और उनके विद्रोही पुत्र हरिलाल के बारे में है।
बापू और हरिलाल दोनों अपनी अपनी  जगह  सही थे लेकिन परिस्थितियाँ कुछ इस तरह बिगड़ी कि एक सुयोग्य पुत्र के मन में पिता के आदर्शों के प्रति नफरत का विष भर गया और इसी आक्रोश ने हरिलाल को पतन की राह पर धकेल दिया।
हरिलाल अपने पिता का बेहद सम्मान करता था । वह भी  अपने बापू की तरह देशसेवा करना चाहता था लेकिन उससे पहले वह विलायत जाकर बेरिस्टर बनना चाहता था। बापू के मित्र डॉ. मेहता उसकी विलायत शिक्षा का खर्च उठाने को भी तैयार  हो जाते हैं लेकिन बापू इस पेशकश को यह कहकर ठुकरा देते हैं  कि मेरी सेवा के बदले मेरे परिवार को लाभ नहीं मिलना चाहिए। हरिलाल को लगता था कि वह एक  महान पिता की संतान होने का दंड भुगत रहा है।
यूं तो पुस्तक के केंद्र में बापू और हरिलाल हैं लेकिन इस सबके बीच 'बा' भी है जो पति और पुत्र के बीच पनपती कड़वाहट में पिसती रहती हैं। हरिलाल की मासूम पत्नी गुलाब, जो पति को बर्बाद होते देखती ही रह जाती है और एक दिन खत्म हो जाती है।
'उजाले की परछाई'  के द्वारा लेखक बताना चाहता है कि बापू वो उजाला थे जिसे पूरी दुनिया अपना आदर्श मानती थी। हरिलाल अपने महान पिता से अलग अपनी पहचान तलाशता रहा, पर 'उजाले' के सामने सदैव 'वह परछाई' ही बना रहा।


प्रकाशन तिथि: मई 22, 2009
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