मोहनलाल भास्कर नामक भारतीय जासूस द्वारा लिखित इस पुस्तक को एक जासूस की आत्मकथा कहा जा सकता है। ये आत्मकथा जासूस के जीवन की
समस्याओं के साथ साथ तत्कालिन पाकिस्तान के सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य का भी बड़ी सफलता से उल्लेख करती है।
भास्कर को पाकिस्तान में परमाणु बम के बारे में जानकारी जुटाने के लिए भेजा गया था। उसी दौरान उनके एक सहयोगी ने धोखा दे कर उन्हें गिरफ्तार करवा दिया था। मोहनलाल कोट लखपत जेल पाकिस्तान लाहौर की सजा-ए-मौत की कोठरी में कैद किया गया था।
वे लिखते हैं कि समरी कोर्ट मार्शल में पाकिस्तान के खिलाफ जासूसी के इल्ज़ाम में उन्हें सज़ा-ए-मौत देने का सुझाव दिया गया था लेकिन पाकिस्तानी फौजी अदालत ने उन्हें 14 साल की बामशक्कत कैद का फैसला सुनाया। सज़ा-ए-मौत से बचने की खुशी में वे दौड़ते हुए बैरक में आए तो औरों ने समझा कि वो बरी हो गए हैं।
सज़ा के दौरान उन्होने कई बार महसूस किया कि वह शायद जिंदा नहीं बचेंगे लेकिन उन्होने तब राहत की साँस ली जब भारत द्वारा कुछ पाकिस्तानी जासूसों को छोड़े जाने के बदले में पाकिस्तानी सरकार द्वारा उन्हें मुक्त कर दिया गया।
इस पुस्तक में पाकिस्तानी जेलों में बंद सैनिकों और जासूसों पर होने वाले अत्याचार के बारे में पढ़कर हम सिहर उठते हैं। बकौल मोहनलाल "पाकिस्तानी जेलों में अत्याचार केवल अत्याचार है और यह सीमा को नहीं जानता।
इल्ज़ाम