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बाज़ार की मांग के अनुसार चलें

लेखक : N.Raghuraman
Review by : DinAx
विजिट्स: 46
शब्द: 300
प्रकाशन तिथि: फरवरी 20, 2008
बाज़ार की मांग के अनुसार चलें
ज्ञान यानी विद्या की तलाश और पढ़ाई का परंपरागत रूप से व्यावहारिक दुनिया से नाता नहीं रहा हैं। आजकल समूचा ज्ञान तर्कशास्त्रीय होता जा रहा हैं और इसी रूप में इनका शिक्षण-कार्य भी हो रहा हैं। डिग्री, विशेषज्ञता और उच्च शिक्षा विषय-विशेष केंद्रित होकर रह गई हैं। ज्ञान की सम्पूर्ण बातें हमें एक उत्पाद की तरह परोसी जा रही हैं, न की बाज़ार की जरूरतों को ध्यान में रखकर या कहें की वास्तविक उपयोगकर्ता की जरूरत को समझकर।
आखिरकार विद्या बाँटने वाले इस मुख्य समस्या को धीरे-धीरे समझने लगे हैं और कई तरीकों से इनमें संशोधन की कोशिश भी करने लगे हैं। कुछ खास क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बदलावों के बावजूद बड़ी संख्या में ज्ञान बाँटने वाले पुरानी शिक्षण-पद्धति का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हैं की एक तरफ़ तो बड़ी संख्या में स्नातकों को नौकरी पाना मुश्किल हो रहा हैं, वहीं दुसरी तरफ़ नियोक्ताओं को प्रशिक्षित कर्मचारी ढूंढे नहीं मिला रहे हैं।
हालांकि कुछ स्कूल-कोलेजों में नवीन तौर तरीकों के ज़रिये व्यावहारिक ज्ञान प्रदान किया जाने लगा हैं। महत्वपूर्ण बात यह हैं की इस ज्ञान को युवा पीढ़ी को लेने की सबसे बड़ी ज़रूरत आन पड़ी हैं। युवाओं को पहले यह तय करना होगा की वे आने वाले १० सालों में क्या करना चाहते हैं।
इसी के मुताबिक उस विषय के विशेषज्ञ से ज्ञान हासिल करने की कोशिश करें। फंडा यह हैं की अगर शिक्षण संस्थानों में बाज़ार की मांग के मुताबिक पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण विषय लागु किए जा रहे हैं तो नई पीड़ी को चाहिए की इस बदलाव के अनुसार डिग्रियाँ , प्रशिक्षण और योग्यता हासिल करें , तभी वह अपने कैरियर को मनोवांछित ऊँचाई पर ले जाने में कामयाब है सकेगी।अपना सार यहाँ लिखें.
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