Hindi Comedy Novel
Summary rating: 2 stars
3 समीक्षा
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शब्द:
600
प्रकाशन तिथि: दिसम्बर 26, 2007
चार सौ बीस - एपिसोड 4
"मुझे भी यही लगता है." उत्तर में वह महाशय बोले.
"मुझे विश्वास है की आप मुम्बई में रहते हैं और वहाँ फिल्मों में काम करते हैं. हो सकता है मैं ने आपको किसी फ़िल्म में देखा हो."
"अरे मेरा ऐसा भाग्य कहाँ. मैं तो कोल्काटा में रहता हूँ." वह महाशय कुछ फूल कर बोले.
"ओ हो अब यद् आया कि मैंने आपको कब देखा था. आपने वहाँ किसी जलसे की अध्यक्षता की थी और उस जलसे में मैं भी मौजूद था."
वह महाशय अपने मस्तिष्क पर ज़ोर लगाकर उस जलसे के बारे में सोचने लगे जिसकी अध्यक्षता उनहोंने कभी नही की थी. फिर कुछ देर बाद बोले, "हो सकता है आपने मुझे किसी ऐसी जगह देखा हो. वैसे मैं तो बिजनेस करता हूँ.
"ओह, किस वस्तु का?"
"तेल का. मेरी कम्पनी सरसों, नारिअल, तिल इत्यादी सभी तेलों की सप्लाई करती है."
"मेरा विचार है की आप आर्डर लेने गए थे और इस समय वापस घर जा रहे है."
"इस समय तो आर्डर लेने जा रहा हूँ."
फिर वहाँ कुछ देर मौनता छाई रही. उसके बाद वही व्यक्ति दुबारा बोला, "आपका शुभ नाम तो मैं पूछना ही भूल गया."
"रेवती रमन. और आपका?"
"मुझे हंसराज कहते हैं."
उसके बाद फिर कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया. फिर हंसराज अपना थैला खोलने लगा. अब उसके हाथ में एक डिब्बा दिखाई पड़ रहा था. जिसमें शायद खाने पीने का सामान था.
"आइये, रेवती जी खाना खा लिया जाए." उसने डिब्बा खोलते हुए कहा.
"धन्यवाद. मैं यात्रा के समय भोजन नही करता."
रेवती रमन ने कहा और हंसराज अकेले ही भोजन करने लगा.
भोजन करने के बाद उसने सिगरेट केस निकाला और एक सिगरेट अपने होंटों से लगा ली. फिर उसने सिरेट केस रेवती रमन की और बढ़ा दिया. उसने भी एक सिगरेट निकाल ली.
"भोजन करने के पश्चात् मैं सिगरेट पीना पसंद करता हूँ." हंसराज ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा.
"और बढ़िया क्वालिटी की ही पसंद करते हैं." एक काश लेने के पश्चात् रेवती रमन ने कहा.
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