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Unique Love Story (Last Part : VI)

द्वारा : krishnakant    

लेखक : Me
मैंने कहा, ‘प्रिया ... तुम्हें सुनना होगा ... वह जो सच है। सुनो प्रिया,’ उन करुण आँसुओं के बीच, वह सुनने लगी, ‘मैंने कभी
तुम्हें अपनी बहन नहीं माना’। वह हतप्रभ सी दिखने लगी। पर उसके आँसू रुक गए और मैं आगे बढ़ा, ‘यही सच है प्रिया। आज तक तुमने जितनी बार भी मुझे राखी बाँधी है, वह चन्द पलों से ज्यादा नहीं टिकी। प्रिया ... यह राखी तुमने बाँधी जरूर थी। पर तुम्हें याद होगा कि बात लन्च की थी। है ना?’ उसने अपना सिर हिला दिया। मैंने फिर कहा, ‘जल्दी जल्दी में तुमने सिर्फ एक गाँठ बाँधी थी, जो बाँधने वाली बहन के नाम होती है यानी कि तुम (अब उसे बहन मानना भी मेरे लिए नागवार था), पर मेरा दिल तुम्हें अपनी बहन मानने के लिए तैयार नहीं था। जब में प्रियाँक के साथ बैठा, तब मैंने आकाश में ईश्वर को देखते हए कहा कि मैं आपकी मर्जी जानना चाहता हूँ भगवान। मुझे सिर्फ एक चिह्न दीजिए जिसे मैं समझ सकूँ। अगर यह राखी रात होने से पहले छूटकर अपनेआप गर गयी, तब मैं समझूँगा कि आप मेरे दिल के साथ हैं और यह भी कि मैं वाकई प्रिया से बेहद प्यार करता हूँ। इतना कहकर मैं मुस्कुराया। मैंने खुदको चालाक समझकर रात तक की मोहलत माँगी थी कि शायद तक तक वाकई दिनभर के खेलकूद में राखी छूटकर गिर जाए। पर मुझे रात का इंतजार नहीं करना पड़ा, मैंने वापस अपनी दाहिनी कलाई पर देखा और मेरे दिल में एक खुशी की तरंग दौड़ गई और चेहरे पर मुस्कुराहट बिखर गई। राखी खुलकर मेरी कलाई से हट चुकी थी। प्रिया, यह राखी दोबारा से गुँजन ने बाँधी है क्योंकि मुझे लगा कि तुम नाराज हो जाओगी। इससे पिछले साल की राखी दोबारा से अर्चना ने बाँधी थी जब वह अपने आप खुलकर गिर गई थी’। मैंने आँह भरी और प्रिया से सिर्फ इतना और कहा, ‘प्रिया! मैंने सिर्फ सच कहा है। हमारा रिश्ता ईश्वर को भी मंजूर है पर भाई-बहन के रूप में नहीं बल्कि दो प्रेमियों के रूप में’।
मैं चुप हो गया। अब प्रिया के चेहरे पर बढ़ती हुई खुशी नजर आ रही थी। वह मुझे सचमुच प्यार करती थी। यह जानने के बाद कि हमारा रिश्ता उतना ही पाक और मासूम है जितना कि सच्चा प्रेम, वह खुदको रोक न सकी और मेरे गले लग गई। मैंने अपने कानों से जाते हुए ये शब्द सुने, जो प्रिया कह रही थी, मेरे गले लगे हुए, ‘आई लव यू’।
                                        ये शब्द जादूई थे।
          पर फिर भी, उतने जादूई नहीं, जितने जादूई वे दो शब्द थे, मैं भी
प्रिया पहले की तरह खड़ी हो गई। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, पर इस बार मुझे खुशी हो रही थी क्योंकि इस बार उन आँसुओं में अपार खुशी और प्यार शामिल था। मैंने उन्हें पोंछने की कोशिश नहीं की। उसके हाथ मेरे हाथ में थे, मैं बस एकटक उसे देख रहा था। दिल ईश्वर को शुक्रिया अदा कर रहा था और उन दो शब्दों की खुशी को महसूस करता जा रहा था।
मेरी आँख खुल गई, पर अभी भी मैं सपने की वह खुशी अपने अंदर महसूस कर रहा था।
******** ईश्वर के इस अनमोल तोहफे से मैं यह तो समझ गया कि वह अहसास कैसा होता होगा जब आपका प्यार आपके प्यार को स्वीकार कर लेता है ******
प्रकाशन तिथि: अगस्त 31, 2007
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टिप्पणियाँ

  1. 0 समीक्षा 25 जनवरी 2008
    1

    dev

    really all by gosh

    All by gosh! by i really appreciate the way writer tried to think, it's really a new dimension altogether.But it seems as everything messed up and a finally we found a relationship unsolved. I must say somewhere or else the author would have studied Siegmund frued.

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