भले ही मैंने यहाँ सीधे तौर पर प्यार नहीं कहा। पर मैं जानता था कि वह समझ गई थी। उसकी आँखों में मैंने एक चमक देखी। उसकी आँखे
अब वाकई
दुनिया की सबसे खूबसूरत आँखें लग रहीं थीं। मैंने अपने आप को पूरी तरह सिर्फ एक वाक्य में बयान कर दिया था और मेरी नजरें उसके जवाब के तलाश में थीं। दिल जोरों से धड़क रहा था और उस बंद कमरे में एक ऐसी खामोशी फैल चुकी थी कि हम एक दूसरे की धड़कनें सुन सकते थे। मुझे नहीं पता था कि वह क्या कहेगी? दिल में एक डर घर गया था। क्या मैंने ज्यादा जल्दी कह दिया था? कहीं मुझे थोड़ा और बनाकर तो नहीं बोलना चाहिए था? मैं अपने दिल की जद्दोजहद सुन रहा था कि तभी
प्रिया ने अपनी बाँई हथेली से मेरे हाथ की दाँई हथेली को कस लिया। मैंने उसकी हथेली को छोड़ दिया और अब मेरी दाँई हथेली उसकी दोनों हथेलियों के कब्जे में थीं, उसके इस तरह छूने पर शरीर में एक और तरंग दौड़ गई, पर अब मैं उसके जवाब को सुनने के लिए तैयार था।
उसने कहा, एक धीमी-प्यारी सी आवाज में, ‘
मैं भी’।
और इन दो शब्दों ने मुझे सारे जहाँ की खुशी दे दी और मेरी जिंदगी सोने सी चमकती हुई
महसूस हुई।
अब यह बात यहाँ और भी मायने रखती है क्योंकि अब मैं प्रिया की आँखों की गहराइयों में प्यार ही प्यार देख रहा था। पर अब मैंने महसूस किया कि वह थोड़ा शर्मा रही थी। मेरे अंदर के मन ने दिल की अपार खुशी को उसी तरह महसूस किया जिस तरह मेरा दिल कर रहा था। मुझे ऐसा लगा कि मैं इस पूरे जहाँ का राजा बना दिया गया हूँ और मैंने सचमुच में, सच्चे प्यार का अहसास महसूस किया।
मैं अपने अंदर की खुशी को महसूस कर ही रहा था और प्रिया से इस बार ‘आई लव यू’ कहने ही वाला था कि उसने अपना सिर नीचे कर लिया और मेरी कलाई को देखने लगी क्योकि उसे कुछ चुभ रहा था जब वह मेरी कलाई पकड़े थी। और तभी उसने देखा! उस कारण को! वह स्तब्ध हो गई और मेरी कलाई छोड़कर लड़खड़ाते हुए दो कदम पीछे खिसक गई। फिर उसने अंगुली से इशारा किया, ताकि मैं भी उस कारण को देखूँ क्योंकि मेरी नजरें आश्चर्यचकित प्रिया पर टिकीं थीं। और फिर मैंने उसे देखा, जिसकी वहाँ कोई जरूरत नहीं थी और अब तक मेरी दाहिनी कलाई पर जिसके होने का मुझे पता तक न था, एक बंधन,
एक राखी!! वही राखी जो प्रिया ने मुझे आखिरी बार रक्षाबंधन पर बाँधी थी। चार साल के बाद भी वह राखी मेरी कलाई पर बंधी हुई थी? उसे देखते ही मेरे चेहरे का रंग उतर गया और इसी के साथ परे कमरे में रोशनी हो गई, जो अब, मुझे चुभने लगी थी। मैंने प्रिया की ओर एक नजर डाली, और देखा कि वह जमीन को एकटक, बिना पलकें झपकाए देख रही है। पर फिर भी उसकी पलकें काँप रहीं थीं। मैं कुछ कहना चाहता था, पर, क्या कहता? कुछ शब्द होते, तब कहता मैंने होठों को हिलाना चाहा, पर सिर्फ इतना ही कह पाया, ‘प्रिया...’, वह भी इतना धीमे कि वह सुन ही नहीं पायी। और अंततः खामोशी, एक अंधेरी चुप्पी को तोड़ने का श्रेय उसी को गया।
उसने कहा, ‘नहीं कृष्णकान्त ... यह गलत है ... तुम ... तुम तो मेरे भाई ... म ... मैंने तो तुम्हें अपना भाई बनाया था। म ... मैंने तुम्हें राखी बाँधी थी’।
वह और कुछ नहीं बोल पायी। वैसे भी सब साफ था और तब मैंने देखा कि, वह अपने चेहरे को दोनों हाथों में छुपाए रो रही थी। यह क्या!! मैंने तो कामना की थी कि मैं उसके होठों की मुस्कान का कारण बनूँ और अब मैं ही उसकी आँखों के नम होने का कारण बन बैठा। पर मैं कर भी क्या सकता था? लेकिन हाँ, एक काम था जो मेरे बस का था। मैं सच को सच और झूठ को झूठ कह सकता था। कभी कभी आँखों देखा भी सच नहीं होता है और इस बार भी कुछ ऐसा ही था।
दो कदम मैंने बढ़ाए, प्रिया तक पहुँचा और अपने दोनों हाथों से उसके हाथों को उसके चेहरे से अलग किया। उसके कोमल गालों पर उन आँसुओं को देखकर मेरे हृदय में वेदना होने लगी। उसने सिर उठाकर मुझे देखा। उसकी आँखें आँसुओं से झिलमिला रहीं थीं। वगह जिस तरह मुझे देख रही थी उससे कम से कम यह तो पता चल गया था कि वह मुझे बेइन्तिहा प्यार करती थी। मैं खुदको और नहीं रोक पाया।
(continued in Part VI)