Unique Love Story (Part IV)
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प्रकाशन तिथि: अगस्त 31, 2007
हम थोड़ा ज्यादा बाहर आ गए थे। कक्षा में वापस जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। मैंने प्रिया के हाथ को खींचकर ऊपर चलने की ओर संकेत किया, बगल में सीढ़ियाँ थीं जो सीधा हमें लैब तक पहुँचा देतीं। बगैर वक्त गँवाए मैं और प्रिया भागते हुए सीढ़ियों से ऊपर जाने लगे, अभी तक उसकी कलाई मेरे हाथ में थी और हम साथ साथ भाग रहे थे। पर मुझे डर था कि कहीं टीचर्स ने हमें देख तो नहीं लिया? मैंने रुककर पीछे देखा, सारिक सर और टिकू मैडम आपस में इतने मशगूल थे कि उन्होंने देखने की जहमत ही नहीं की, जब, हमारे पैर जोर से सीढ़ियों को दबाए जा रहे थे क्योंकि आवाज काफी आ रही थी।
हमने अब आराम से जाना शुरू किया और चंद कदम और चलने के बाद, हम लैब में पहुँच चुके थे। और अब शुरू हुआ मेरे अचेतन मस्तिष्क का कमाल।
लैब में ऐसा कुछ नहीं था, जो हमें यह आभास ही दे देता कि हम लैब में थे। वह एक बड़े कमरे जैसा लग रहा था। और तभी, बस मेरी पलकों के झपकने के साथ, कमरे में एक बड़ा सा डिब्बा, अचानक से, प्रकट हो गया। और यकीनन अब मुझे वाकई आश्चर्य होने लगा। पर फिर, प्रिया ने चमककर कहा (जैसे उसे कुछ विचित्र नहीं लगा), ‘देखो, कृष्णकान्त, यह एक खेल है, और इसे मेरे पापा ने बनाया है!’
मैंने सही कहा था कि मेरे अचेतन मस्तिष्क का कमाल शुरू हो चुका था क्योंकि जहाँ तक मैं प्रिया के पापा के बारे में जानता हूँ, तो दूर दूर तक उनका खिलौने और खेल बनाने में कोई संबंध नहीं है, तो यह बात तो चमत्कार से कम नहीं थी कि ऐसी विचित्र बात मेरे दिमाग ने मेरे सामने पेश की। और यह बात यहाँ बताने की है कि अब उसके पिता इस दुनिया में नहीं हैं। मुझे यह सुनकर दुख भी हुआ और यह अहसास भी कि मैं उससे क्योंकि नहीं मिल पाया, अरे! मैंने तो उसे एक फोन तक नहीं किया। भले ही मेरे पास उसका फोन नम्बर नहीं था, पर उसका नम्बर मुझे कैसे भी मिल जाता। पर सचमुच, मुझे नहीं पता कि मैंने ऐसा क्यों किया?
खैर, आगे बताता हूँ।
यह कहते हुए प्रिया बहुत खुश थी। मेरा हाथ छोड़कर वह जल्दी से डिब्बे के पास गई और एक बटन दबाया, और एक फिल्मी अंदाज में डिब्बा भाप छोड़ते हुए खुलने लगा। उसकी चारों दीवारें नीचे जाने लगीं और तब मुझे पता चला कि वह पहले से ही ऊपर से खुला था, और यह भी कि वह जैसा भी खेल था, पर उसमें तकनीक का बखूबी प्रयोग किया गया थआ। जब वह पूरी तरह खुल गया, तब मैंने देखा कि, वह एक बहुत अलग सा खेल था। हमने थोड़ी देर तक मस्ती की और वह खेल खेला। मैं बिल्कुल भूल चुका था कि मुझे प्रिया से जरूरी बात करनी थी। खुशी और मस्ती के उन चन्द लम्हों ने मुझे वाकई एक खुशनुमा इंसान बना दिया था। पर यह ज्यादा देर तक नहीं रहा। जैसे कि उस खेल ने मेरा मन पढ़ लिया हो, जैसे ही मुझे याद आया कि मुझे अपने प्यार का इजहार करना है, अचानक से वह गायब हो गया। हम दोनों पहले की तरह जमीन पर थे, बस इस बार प्रिया के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी। लैब का वह बड़ा कमरा फिर से वीरान हो गया था। कोई आवाज, कोई रोशनी कमरे में नहीं थी। पर फिर भी रोशनी का एक खतरा भगवान के घर से शुरू होकर हमें जगमगाने के लिए हमारे ऊपर गिर रहा था।
मैंने एक गंभीर आवाज में कहा, ‘प्रिया! मैं तुमसे एक बहुत जरूरी बात करना चाहता हूँ!’
यह कहते वक्त मेरे दिल की धड़कन तेज होने लगी थी, क्योंकि अब मैं अपने दिल की बात कहने जा रहा था। प्रिया अभी तक मुस्कुरा रही थी।
मैंने कहा, ‘क्या तुम कासिफ को पसंद करती हो?’
सच कहता हँ, मैं ‘ना’ ही सुनना चाहता था। बल्कि साथ में चंद वाक्य और, जैसे, ‘वह मुझे बहुत बेकार लगता है, या वह बहुत पकाऊ है या बहुत अंदाज झाड़ता है, या घमंडी है या कुछ भी। मैं प्रिया के जवाब का इतजार कर रहा था। उसके होंठ हिले और मैंने सुना, ‘हाँ ... थोड़ा बहुत!’
मुझे वास्तव में बुरा लगा, पर उस ईश्वर ने मुझे इतनी हिम्मत दी कि मैं अपनी बात आगे बढ़ा सकूँ।
यह कहने के बाद, मैंने प्रिया के चेहरे को पढ़ने की कोशिश की, जिसमें एक हल्की शरारत झलक रही थी। मैंने प्रिया की दाँई कलाई को थाम लिया। इस बार मेरे छूने से जैसे उसे भी कुछ हुआ, वह मेरा चेहरा पढ़ने की कोशिश करने लगी। मैंने उसकी हथेली को अपने दोनों हाथों के बीच हथेलियों में जोर से पकड़ा, तो अचानक ही उसके दिल की धड़कन तेज हो गयी और मैं उस वीराने में उन्हें साफ सुन सकता था। उसकी आँखों की गहराई बढ़ती जा रही थी। और इस बार, होंठ हिलाने की बारी मेरी थी।
मैंने कहा, ‘क्योंकि मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूँ’।
(continued in Part V)