Unique Love Story (Part III)
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प्रकाशन तिथि: अगस्त 31, 2007
यह वाक्य छोटा था। पर इसने उसे बता दिया था कि मेरे दिल में उसके लिए कितनी नफरत आ चुकी थी। अपनी नफरत की हद बताने के लिए मैंने पूरी ताकत से कासिफ को पीछे की ओर उछालकर धकेल दिया। उसका सिर जोर से दीवाल में टकराया और ‘धड़ाम’ की आवाज के साथ वह अपनी सीट पर गिर पड़ा। इस पूरे वाक्ये के वक्त सिर्फ एक अजीब सी बात हुई। वह यह, कि किसी को भी, पूरी कक्षा में पता नहीं चला कि आखिर क्या हुआ? बाहर से तो, वे चारों लड़के भी शांति से एक ओर खड़े रहे। कासिफ ने भी पलटकर पीछे से वार करने की जुर्ररत नहीं की। उस आलम में अगर वह मुझसे उलझने की भूल कर देता, तब शायद वह खुदको अस्पताल में पाता।
मैंने अपने अंदर के शैतान को शांत कराया जो प्यार के उस अनजाने से अहसास को खो देने के डर से तड़प कर क्रोध के चादर में छुपने की कोशिश कर रहा था। अब दिल ने अपनी चलानी शुरू की। डर से ही सही, पर मैं फिर भी प्रिया की सीट की ओर बढ़ा। मैं सोचता जा रहा था कि वह इतने सोलों बाद मुझे देखकर कैसा महसूस करेगी? वह खुश होगी या मुझे भूल चुकी होगी? वह कैसा व्यवहार करेगी? और सबसे बड़ा सवाल, जो रह-रह कर डरा रहा था। क्या वह ‘हाँ’ कहेगी?
सचमुच, मुझे खुद पता नहीं चला कि मैं कब उसकी सीट के ठीक सामने आकर खड़ा हो गया था। मैं नर्वस था और पैर काँप रहे थे। शरीर में एक झुरझुरी सी आने लगती थी। और इसी से मुझे पता चला कि मेरे अंदर का शैतान शांत हो गया था।
धीमी पर साफ आवाज में मैंने उसे पुकारा (वह सिर नीचे किए, माधुरी के साथ मैथ्स का सवाल हल कर रही थी), ‘प्रिया!’ ऐसा लगा कि उसने सुना नहीं था। मैंने थोड़ा और जोर से कहा, ‘प्रिया!’
उसकी कलम रुक गई और खुद भी। शायद मेरी आवाज में उसने वह अहास महसूस किया जो मैं उस तक पहुँचाना चाहता था। उसने सिर ऊप किया और चार साल बाद मुझे देखकर, वह दंग रह गई। उसकी सुंदर आँखें, पूरी खुली हुईं थीं जो उसके आश्चर्य का प्रमाण दे रहीं थीं। हत्प्रभ सी उस आलम में, वह खड़ी हुई और एकटक सी मुझे देखती रही। मैं मुस्कुरा रहा था और उसकी आँखों में धीरे धीरे बढ़ती हुई चमक को देखकर खुश हो रहा था, जो उसकी खुशी का प्रमाण था, फिर चाहे उसके चेहरे से उस वक्त विस्मय के अलावा और कुछ क्यों ना झलक रहा हो।
उसी आलम में, बेहद धीमी आवाज और सुरीले स्वर में (मुझे लग रहे थे), उसने सिर्फ इतना कहा, ‘कृष्णकान्त!!’ और वह कुछ नहीं बोली।
मेरी उपस्थिति माधुरी के लिए कुछ खास मायने नहीं रखती थी क्योंकि ना वह मुझे देखकर खुश हुई और ना ही मुझे हैलो कहने का कष्ट उठाया। खैर, मुझे भी कहाँ इस बात की चिंता थी। जिसे मुझे देखकर खुश और चकित होना चाहिए था; वह हो रही थी। अब मुझसे और नहीं रहा गया। मैंने प्रिया से कहा, ‘मुझे तुमसे कुछ बात करना है!’ मैंने प्रिया के जवाब का इंतजार किया, पर वह सम्मोहन में थी। शायद उस, ुझे देखकर कुछ ज्यादा ही खुशी हुई थी (जहाँ तक मैं सोचता हूँ)। मन की झुरझुरी और डर ने अपार उत्साह का रूप ले लिया था।
मैंने दोबारा जोर देकर कहा, ‘मुझे तुमसे वाकई कुछ जरूरी बात करना है’। मैंने इस बार जवाब का इंतजार नहीं किया। और मुझे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था, जब मैंने प्रिया की कलाई पकड़ी और उसे सीट से बाहर आने के लिए मजबूर किया। और तब मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही जब बिना कुछ कहे, वह सीटसे बाहर आ गई। अब वह चकित सी मुद्रा में नही थी बल्कि अब वह मुस्कुरा रही थी। उसकी उस मुस्कान ने मेरे दिल में एक ठंडी लहर सी दौड़ा दी। मौसम बेहद रंगीन लगने लगा था। अभी तक प्रिया की कलाई मेरे हाथ में थी।
मैंने कहा, ‘मुझे तुमसे अकेले में एक जरूरी बात करना है ... मेरे साथ चलो!!’
उसकी कलाई को थामे हुए, मैं आगे बढ़ा और प्रिया भी साथ चलने लगी। ठीक अभी, हमें माधुरी की आवाज सुनाई दी। और जो उसने कहा, उससे हमें पता चल गया कि माधुरी हमारी बातों का एक एक शब्द सुन रही थी (हालाँकि सिर्फ मैं बोल रहा था)।
उसने कहा, ‘अगर तुम दोनों को जरूरी बात करनी है तो इस बात का ध्यान रखना कि कहीं कोई टीचर देख ना ले। पीरियड बस शुरू होने ही वाला है’। भले ही उसने थोड़े रूखेपन से कहा पर मुझे खुशी हुई कि वह भी ध्यान दे रही थी कि मैं वहाँ था। मैं और प्रिया एक दूसरे की ओर देखकर फिर मुस्कुरा दिये। जाते जाते मैंने जोर से कहा, ‘थैंक्स माधुरी’।
हम कक्षा के गेट से बाहर निकले ही थे कि हमने के. वि. नं 1 के सारिक सर और टिक्कू मैडम को देखा। यह एक और आश्चर्यजनक बात थी। वे सीधे हमारी ओर ही आ रहे थे।
प्रिया ने कहा, ‘अब क्या करें?’
(continued in Part IV)