फिर! मैं दिल से मुस्कुरा दिया। और काफी देर तक एकटक देखने के बाद मैंने अपनी पलकें झपकाईं। खैर स्वप्न तो स्वप्न ही होता है,
इतनी देर बाद भी आँखों में आँसू नहीं आए थे।
पता नहीं मैंने पलकें क्यों झपकाईं? ना झपकाता तो ज्यादा अच्छा होता। स्पॉटलाइट खत्म हो चुकी थी और कक्षा में अचानक से पहले जैसी रोशनी होने लगी थी और उस रोशनी में मैंने
प्रिया के खिलखिलाकर हंसने का कारण जान लिया। मेरी खुशी और मुस्कान क्रोध के एक ऐसे ज्वार में बदल गयी थी, जिसमें मैं सबकुछ खत्म कर देना चाहता था। आज तक मैंने असली जिंदगी में भी ऐसा कभी महसूस नहीं किया था। क्योंकि उस रोशनी में मुझे और चरित्र नजर आने लगे थे। और मैंने देखा, पहली सीट पर तीन का राज था। बाँये तरफ माधुरी बैठकर पढ़ रही थी, बीच में बेंच पर प्रिया और दाँई ओर एक लड़का जो प्रिया के हँसने का कारण बना बैठा था,
कासिफ! अब मैं वाकई अपने अंदर जलन को महसूस कर रह था और करता भी क्यों ना? आखिर जिस खिलखिलाहट का कारण मैं इतने सालों में न बन सका, ये कासिफ चंद लम्हों में ही बन बैठा। मैंने वही भावना महसूस की जो मैं अपनी असली जिंदगी में करता। शायद मैंने दिल से प्रार्थना की थी कि ‘हे भगवान! इस बेकार इंसान को अभी वहाँ से भगाओ!’ क्योंकि यह सोचने के बाद मैंने देखा कि कासिफ अब सीट से उठ रहा था। मुझे होंठ पढ़ना नहीं आते, पर फिर भी अब मुझे काफी हद तक उन दोनों की बातें समझ आ रहीं थीं। सीट से उठ जाने के बाद कासिफ खड़ा रहा और प्रिया से बोला, ‘तुम्हारा साथ वाकई खुशनुमा है, प्रिया। पर अब कोई न कोई टीचर आने वाले होंगे। इसलिए मैं अपनी सीट पर जाता हूँ’।
इतना कहने के बाद वह सीट से बाहर आ गया और पलट। पर न जाने उस वाहियात इंसान को क्या सूझी कि वह वापस मुड़ा और प्रिया का दाँया हाथ लेकर उसे नवाबों के अंदाज में झुककर चूम लिया। मैं उसकी इस हरकत को बर्दाश्त नहीं कर पाया। गनीमत थी कि मेरे हाथों में फिजिक्स की बुक नहीं थी, वरना उसका भी वही हाल होता जो मेरे हाथ में रखी मामूली पेंसिल का हुआ। मैंने उसे दो टुकड़ों में तोड़ दिया था। आँखों का आक्रोश बढ़ गया था। इससे पहले कि मेरे अंदर का शैतान जाग जाता, मैंने प्रिया की ओर देखा। अब वह सीट पर बैठ चुकी थी और मग्न माधुरी से कुछ चर्चा कर रही थी। मैं अपनी सीट से बाहर आ गया। पेंसिल के टुकड़ों को पीछे की ओर उछाल दिया और वैसे ही खड़ा रहा। मैं सोच रहा था और इस उधेड़बुन में था कि किस ओर कदम रखूँ। प्रिया की सीट की ओर या कासिफ की सीट की ओर। दिल प्रिया की ओर ले जाना चाहता था, पर क्रोध के उस बवाल ने मुझसे कहा कि ‘पहले कासिफ से हिसाब तो चुकता हो जाए, उसके बाद प्यार का इजहार करेंगे’। और बवाल के आगे, दिल की एक न चली और क्रोध से भारी कदम मैंने सबसे बाँयी कतार (बीच के बगल वाली) की पीछे से पाँचवी सीट की ओर बढ़ाए। जहाँ कासिफ बैठ चुका था और उसके हंसने की आवाज मेरे कानों में चुभ रही थी। पहले मुझे लगा कि चार साए उसका पीछा करते हुए उसकी सीट के बगल में झुण्ड बनाए खड़े हो गए हैं, पर जब तस्वीरों ने खुदको और साफ किया तो मैंने पाया कि वे चार साए, के. वी. नं 1 के ग्यारहवीं ‘ब’ के लड़के थे, केतन करन, बासुमित्र मिश्रा, अभिषेक त्रिपाठी और आदित्य शर्मा। मेरी नजरों को पैना हो जाना पड़ा जब मैंने बेहद गौर से, रुककर सुना।
अपनी उस तीखी हंसी में मैंने केतन को कहते सुना, ‘कमाल है यार! आज के समोसे पक्के! शर्त तेरे नाम!’
और तब मैंने जाना कि कासिफ ने केतन से शर्त लगाई थई कि वह प्रिया का हाथ चूम सकता है। मेरा खून खौलने लगा, पर मैं यह सब भूल जाता अगर मैंने कासिफ के मुँह से निकली बात को अनसुना कर दिया होता।
जब उसने अपनी हँसी रोकी, तब कहा, ‘दोखा मेरा जलवा! मैं किसी भी लड़की को पटा सकता हूँ!’
अब बहुत हो चुका था। पाँचों चुभने वाली हँसी हँसने लगे थे जो बर्दाश्त के बाहर थी। और तभी मेरा क्रोध बाहर निकल आया। आँखें लाल हो गयीं थीं (यकीनन मैं महसूस कर पाया था) और मैं बेहद तेज कदमों के साथ कासिफ की सीट तक पहुँचा और पूरी ताकत और रफ्तार के साथ कासिफ की कॉलर पकड़कर उसे सीट से उठाया और उसकी आँखों में घूरने लगा। मुझे ऐसा लगा कि भगवान मुझे दुनिया की सारी ताकत दे दे और मैं कासिफ को बीच से, जरासंध की तरह, फाड़कर फेंक दूँ। पर यह नामुमकिन था। अपनी आवाज़ को मैंने रात के अंधेरे की तरह डरावना और साफ बनाया और इस अचानक हुए हमले से डर चुके कासिफ से कहा,
“दोबारा...प्रिया के आसपास भटकने की भी...हिम्मत मत करना, समझा!”
(continued in Part III)