Unique Love Story (Part I)
Summary rating: 2 stars
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प्रकाशन तिथि: अगस्त 31, 2007
Hey people, don''t get misunderstand after reading that i''d fallen in love with my sister!!
“सच्चे प्यार का अहसास”
आज चमकते हुए दिन की शुरुआत माँ की आवाज से हुई, ‘आशू, उठो’। मैं आँखें मलते हुए उठा और स्कूल के लिए तैयार हुआ। ब्रेड और चाय लेकर मैं घर के दरवाजे से बाहर आया और कहा, ‘माँ मैं स्कूल जा रहा हूँ’। माँ ने ‘हाँ’ के स्वर में उत्तर दिया और मैं पैदल चल पड़ा और फिर मैंने अपने घर के बाहर के लोहे के दरवाजों को लगा दिया। मैं पलटा ही था कि मेरे स्वप्न का दूसरा चरण आरम्भ हुआ। मैं अपने स्कूल (के. वी. नं 1 नहीं बल्कि के. वी. नं 5) के चैनर दरवाजों के सामने खड़ा था। मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं हुआ। बल्कि मैं सहजता से दरवाजे के जरिये चला गया। उस बरामदे में कोई नहीं था। वह सुनसान और वीराने जैसा था। सामने टंगी दीवाल घड़ी की टिक–टिक गूँज रही थी, पर मैं फिर भी अच्छा महसूस कर रहा था। हमारी कक्षा बाँयी ओर थी। बगल से सीढ़ियाँ थीं जो ऊपर की कक्षाओं तक ले जातीं थीं और फिर सबसे ऊपर लैब में। मैंने बाँई ओर कदम बढ़ाए, घड़ी की गूँज खत्म होने लगी और साथ ही बच्चों की चहलपहल की आवाजें तेज होने लगीं। मैं अंदर गया और मुस्कुराया। यह मेरी कक्षा थी। कमाल की बात यह थी कि कमरे की लम्बाई के. वी. नं 1 के बारहवीं ‘अ’ के कमरे के बराबर थी। यह कैसे हुआ पता नहीं। पर मेरी सहजता फिर भी बरकरार रही। पर अजीब बात यह थी कि मेरे सहपाठी, सभी के. वी. नं 1 के बारहवीं ‘अ’ के थे। मुझे अपना सपना अच्छी तरह से याद है, मैं अपने भूतपूर्व विद्यालय के. वी. क्र. 5 में ही था। बस यही चंद बदलाव थे। फिर मैंने कक्षा की द्योढ़ी पर ही खड़े खड़े कक्षा को पूरा देखा। पूरी कक्षा की सीटें बस्तों से भरीं थीं जबकि बच्चे इतने नहीं थे। फिर भी मैंने देखा कि कक्षा के अंत में सिर्फ एक सीट खाली थी। मैंने आंह भरी और कदम बढ़ाए। कानों में शोर बढ़ता जा रहा था और मेरी मुस्कुराहट भी। ना जाने क्यों पर यूँ ही आज मन खुश महसूस कर रहा था। मैंने अपना बैग सीट पर रख दिया और सामने की ओर देखा जहाँ ब्लैक बोर्ड ता। कक्षा, सीटों की तीन कतारों में बंटी हुई थी। सबसे आगे मेज रखी हुई थी और उस पर चॉक का डिब्बा था। मेज दाँयी ओर ज्यादा खिसकी हुई थी और इसीलिए में उसे देख पाया क्योंकि बीच की कतार की पहली तीन सीटें घिरी हुईं थीं और यह मेरा अंदाजा ही था। तीसरी सीट पर तीन बच्चे खड़े होकर शायद किसी विषय की किताब पढ़ रहे थे या आपस में बातचीत कर रहे थे। ये मुझे पता नहीं चला पर उनकी वजह से सबसे पहली और दूसरी सीट पर क्या चल रहा था, मैं नहीं देख पाया। अपना रुख पलट कर मैंने बैग से फिजिक्स की किताब निकाली और अपनी सीट पर बैठ गया। अभी मैंने बस कुछ पन्ने पलटे ही थे कि मन में ख्याल आया कि सामने देखूँ। ना जाने क्यों, पर थोड़ी देर तक मैं सामने, बिना किसी मकसद के, देखता रहा। फिर अचानक ही मुस्कुरा दिया, अभी अपनी नजरों को नीचे किया ही था, कि एक हंसी, कक्षा के शोरगुल में भी साफ सुनाई दी और वह हँसी जानी पहचानी थी। नजरों को एक बार फिर उठ जाना पड़ा। पहली सीट तक की बाधा बने, वे तीन बच्चे अब दृश्य के और साफ होने पर लड़के लगने लगे थे। वे सामने से हटे और फिर मैंने जो देखा वह इतनी आसानी से, स्पष्टता से बयान कर देने वाला अहसास नहीं था। मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रह था, मुझे अपनी सीट से खड़ा हो जाना पड़ा। दिल में, खुशी की इतनी तीव्र लहर मैंने कभी महसूस नहीं की थी। खुदकी पलकों को बार-बार झपकाया, पर वह दृश्य असली था। और मैं एक खुशनुमा आश्चर्य महसूस करने लगा क्योंकि सबसे पहले सीट के ठीक ऊपर, दाँए तरफ चेहरा किये हुए वह बैठी थी, प्रिया! पर यह कैसे हो सकता था? जब मैं भी आठवीं कक्षा में था तब प्रिया आठवीं कक्षा पास करने के बाद चली गई थी। वह पहली बार कक्षा में पाँचवी आई थी। आखिरी बार उसका चेहरा जो मुझे याद है, उसके आँसुओं के साथ था। आज उसके चेहरे पर खिलखिलाहट देखकर मुझे सच्ची खुशी मिली। साफतौर पर कहूँ तो मुझे कुछ और नजर ही नहीं आ रहा था। सारा शोर, उस खिलखिलाहट के आगे दब सा गया था। मेरे मन ने मुझे प्रिया की जो तस्वीर दिखाई, वह मेरी कल्पना से भी परे थी। प्रिया के बाल बिल्कुल काले थे और मेरी बड़ी दीदी के बालों जितने लम्बे थे, पर कहीं ज्यादा रेशमी। वह पहले से कहीं ज्यादा गोरी लग रही थी, उसकी आँखों से ज्यादा सुंदर आँखें मैंने आज तक नहीं देखीं थीं। और उसकी खिलखिलाहट ने मेरे दिल को अंदर तक गुदगुदा दिया था। मुझे सिर्फ और सिर्फ प्रिया ही नजर आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि किसी ने कक्षा में बिल्कुल अंधेरा कर दिया हो और बस एक स्पॉट लाइट, ना जाने कहाँ से, सिर्फ प्रिया के ऊपर गिर रही हो। मैं सारी जिंदगी प्रिया के उस अनुपम चित्र को ही देखना चाहता था।<>(continued)