क्या मानव अजर हो सकता है ?
भारत में मेडिकल क्षेत्र में एक असामान्य विषय चर्चा का केन्द्र बना हुआ है. कुछ वर्ष पहले मुकेश अम्बानी गर्भ विज्ञान विशेषज्ञ अपनी मित्र फिरूजा पारिख और उनके पति न्यूरोसाइक्राट्रिस्ट राजेश पारिख से बात कर रहे थे.
फिरूजा बताती है ‘हम इकट्ठे बैठे बात कर रहे थे कि इस शताब्दी के पहले भाग मेडिकल बायोटैक्नालाजी हमारे जीवन पर हावी रहेगी. मेरा यह कहना ही था कि श्री अम्बानी ने मेरे सामने अपनी बायोटेक्नालाजी संबंधी परियोजना का संस्थापक निदेशक बनने का प्रस्ताव रख दिया और कहा कि हम कल से यह काम शुरू कर सकते हैं तो उन्होंने झट से पूछ लिया कि आज से क्यों नहीं ?’
और इस तरह से अमरीका के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान द्वारा मुख्य कोशिश पर कार्यरत 10 प्रमुख संस्थानों में तीसरे नंबर पर विद्यमान रिलायंस लाइफ सांइसिज ( आर. एल. एस. ) का जन्म हुआ. थोड़े से अंतराल में जिस गति से इस संस्थान के प्रगति की है उस पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है.
यहीं नहीं भारतीय प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक की प्रगति पर इस वर्ष पूरे विश्व का ध्यान केन्द्रित है. रिलाइयंस की इस परियोजना के अलावा बैंगलूर में राष्ट्रीय जैविक विज्ञान केंद्र ( एन सी बी सी ) भी मुख्य कोशिका संबंधी इस शोध में सलंग्न है जिसे लेकर वैज्ञानिकों का मानना है कि डायबिलिटेटिंग बीमारियों के इलाज के उपायों को विकसित किया जा सकता है. एन सी बी एस में मुख्य कोशिका शोध में शामिल डा. मित्रादास एम. पाणिकर बताते है कि उनका दल इस क्षेत्र में कुछ वर्षो से कार्य कर रहा है लेकिन अपने हर प्रयास पर हम एहतियात बरतते है क्योंकि हमें मालूम है कि अभी हम प्रारंभिक चरण से गुजर रहे है. इन दो अनुसंधान संगठनों पर अमरीका इसलिए भी रूचि दिखा रहा है क्योंकि आर एल एस के पास भ्रूण कोशिकाओं की सात सैल लाइंस कालोनियां है जो कई प्रकार के ऊतकों को विकास कर सकती है जबकि बैंगलूर में ऐसी तीन ही लाइंस है. अमरीका में जहां इस अनुसंधान ने वैज्ञानिकों के बीच हलचल पैदा की है, वहीं कुछ लोगों ने इस पर विरोधी प्रतिक्रियाये व्यक्त की है क्योंकि मुख्य कोशिकाओं तक पहुंचने के लिए मानव भ्रूण को नष्ट करना पड़ सकता है और इसे नष्ट करने का अर्थ है जीवन खत्म करना. समझौते के तौर पर जार्ज बुश प्रशासन ने मौजूदा सैल लाइंस पर अनुसंधान हेतु सरकार को दिये जाने वाली आर्थिक सहायता को सीमित करने के लिये एक नीति बनाई है.
भारत में यद्यपि इस तरह की किसी नीति की संभावना दिखाई नहीं पड़ती, मगर वैज्ञानिक और अधिकारीगण इस तरह के प्रयोग के लिये प्रदात्ता की सहमति लेना अनिवार्य समझते हैं.
हैदाराबाद के एल. वी. प्रसाद नेत्र संस्थान जैसे केंद्र व्यस्क मुख्य कोशिका पर अपना शोध जारी रखे हुये है. ऊतकों के भीतर विकसित होने की क्षमता होती है. हाल ही में किये गये अध्ययनों से पता चला है कि एक प्रकार की कोशिका में दूसरे प्रकार के ऊतकों में विकसित होने और परिवर्तित होने की क्षमता होती है.
इसे एक अन्य उदाहरण से समझा जाये तो मनुष्य के नेत्रों का एक भाग जिसे लिम्बस कहा जाता है, द्वारा कार्निया को उत्पन्न करने से ही नेत्र के विकार उत्पन्न होते है, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति अंधा हो सकता है. और इस बीमारी का उपचार है लिम्बल उत्तकों को स्थानांतरित ( ट्रांसप्लांट ) करना. हैदाराबाद के इस नेत्र संस्थान में डॉक्टर रोगी की स्वस्थ आंख में से 1-2 एम लिम्बल उत्तक निकाल लेते है, एक समुचित सतह पर उनका संवर्धन करते है और फिर उसकी विकारग्रस्त आंख में इन्हें डाल देते है. वैसे यह उपचार भारत के आलावा दो और देशों अमरीका और ताइवान में ही उपलब्ध है.
व्यस्क कोशिका पर शोध करने वाले एक और विशेषज्ञ और नई दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल आजाद के शल्य चिकित्सक डा. बालकृष्ण मातापुरकर को अमरीका से उस तकनीक के लिए एक स्व अधिकार मिला है, जिसके जरिये क्षतिग्रस्त कोशिकाओं और उत्तकों को पुर्नजीवित किया जा सकता है.
लेकिन यदि डाक्टर इस तरह की तकनीकों को पूरी तरह से विकसित कर लेते है तो इसका अर्थ यह होगा कि मनुष्य अब वृद्धावस्था से भी छुटकारा पा लेगा. इस बारे में फिरूजा कहती है कि इस विषय को लेकर शोध कार्य जारी रहेगा, लेकिन फिलहाल हम इन कोशिकाओं के विकास के माध्यम से डायबटीज और पार्किसन जैसे बीमारियों के सहज और सटीक उपचार अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे है. इस शोध का मेडिकल क्षेत्र पर और क्या- क्या प्रभाव पड़ेगा, यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा मगर भारत की कुछ बायोटेक कंपनियां अभी से ही इन कोशिकाओं पर शोध कर रही प्रयोगशालाओं से जुड़ने का मन बना चुकी है. हालांकि मेडिकल थैरेपी पी स्टैम कोशिकाओं की शोध अभी 7 से 8 वर्ष लग सकते हैं. इस बारे में संस्थान के डाक्टरों और अन्य वैज्ञानिकों का भी यही कहना है कि अभी से ही अपनी उपलब्धियों पर खुश होकर संतुष्ट हो जाना ठीक नहीं है, क्योंकि अभी इस विषय पर बहुत सा शोध करना बाकी है.
लेकिन यह विषय इतना महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी इसकी प्रगति पर सूक्ष्मता से नजरें गढाये हुये है. अमरीका में भी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने विभिन्न समाचार पत्रों के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. जैसा कि यह शोध की महत्ता का प्रश्न है इसकी विशेषता की उपयोगिता आने वाला समय ही बतायेगा.
क्या मानव अजर हो सकता है के बारे में अधिक समीक्षाएं