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अंतरराष्‍ट्रीय फुटबॉल का खुमार

Summary rating: 5 stars 2 समीक्षा
Review by : garima g
विजिट्स: 661
शब्द: 900
प्रकाशन तिथि: मार्च 06, 2006
भारतीय युवकों पर चढ़ा अंतर्राष्‍ट्रीय फुटबाल का खुमार

विशाखापटृनम निवासी कौशिक राय, जो कि हिंदुस्‍तान पेट्रोलियम, कारपोरेशन के मार्किटिंग मैनेजर हैं, पिछले काफी दिनों से अपने साप्‍ताहांत पर घर में टीवी पर ऐसे खेल का लुफ्त उठा रहे हैं जिसकी चकाचौंध किसी को भी प्रभावित किये बिना नहीं रह सकती, दुर्भाग्‍यवश यह खेल क्रिकेट नहीं हैं, यह है फुटबाल और वो भी अंतरराष्‍ट्रीय सॉकर जहां भारतीय खिलाडि़यों का नजर आना असंभव है. कौशिक राय कहते हैं. ‘’बोरिंग क्रिकेट मैचों की तुलना में सांस रोक देने वाले ये उच्‍च स्‍तरीय सॉकर मैच कहीं अधिक आनंददायक है।
कौशिक राय ही नहीं बल्कि देश भर के अधिसंख्‍य युवकों में इन दिनों अंतराष्‍ट्रीय फुटबाल मैचों के प्रति रूचि काफी बढ़ गई हैं, मैच चाहे इंग्लिंश प्रीमियर.लोग के हो या स्‍पेनिश लीग, युवक एक भी मैच देखना नहीं भूलते. सहवाग, द्रविड़ और यहां तक कि तेंदुल्‍कर से भी ज्‍यादा ये लोग डेविड बेकहम, रिवाल्‍डो, टानी एड्म्‍स और लुई फिगो के प्रशंसक हो गये हैं. यही नहीं इन अंतराष्‍ट्रीय मैचो की टी आर पी (टेलीविजन रेटिंग प्‍वांइट्स) में भी पिछले कुछ समय में बेतहाशा वृद्धि हुई है। यह टी आर पी 7वें से 8वें स्‍थान पर पहुंच गई हैं जिसके चलते ई.एस.पी.एन और स्‍टार स्‍पोर्ट्स जैसे टी वी चैनलों की चांदी हो गई हैं.

अब प्रश्‍न यह उठता है कि भारतीय युवकों में अंतराष्‍ट्रीय फुटबाल के प्रति दिन ब दिन बढ़ रही रूचि क्‍या हमारे लिए हर्ष का विषय है? निश्चित रूप से हम इस पर गर्व करने की स्थिति में नहीं हैं क्‍योंकि जहां तक राष्‍ट्रीय फुटबाल के प्रदर्शन का मामला हैं, अंतराष्‍ट्रीय स्‍तर पर भारत के प्रदर्शन में गिरावट जारी है और हाल ही की फीफा रेटिंग में भारत बहुत निचले स्‍थान पर पहुंच गया है। और ऐसे में अंतराष्‍ट्रीय सॉकर का बुखार भारतीय युवकों को क्‍यों न चढे़ ? आखिर क्‍वालिटी का हर कोई दीवाना होता है. दिल्‍ली के सोशल साइंटिस्‍ट आशिष नंदी का कहना है कि इस स्थिति के लिये भारतीय फुटबाल ही नहीं बल्कि क्रिकेट की अधिकता भी जिम्‍मेदार है. क्रिकेट देश का दीवानापन है. लेकिन पिछले कुछ सालों में लगातार क्रिकेट का मुजायरा करने या फिर मैच फिक्सिंग जैसे स्‍कैण्‍डलों के उभरने से क्रिकेट की साख को काफी नुकसान पहुंचा. ऐसे में खेल प्रेमियों ने क्रिकेट का विकल्‍प तलाशना शुरू कर दिया और इसके लिये उन्‍हें अंतराष्‍ट्रीय सॉकर से बेहतर और कोई विकल्‍प नहीं लगा.उधर भारतीय फुटबाल की दुर्दशा तो अब सुनाने योग्‍य भी नहीं। कलकता में हाल ही में सपन्‍न हुए दुर्गा पूजा समारोह के दौरान घरेलू फुटबाल में रूचि रखने वाली एक कंपनी युनाइटिड ब्रीवरीज ( जो कि मोहन बागान और ईस्‍ट बंगाल क्‍लबों के मैच प्रायोजित करती हैं ) ने भारतीय फुटबाल सितारों आई एम विजयन और जो पाल अंचेरी आदि के पोस्‍टरों;आटोग्राफ्स वगैरह से सुसज्जित स्‍टाल लगाए मगर यह प्रयास सुपर फ्लाप रहा. उनकी उम्‍मीद से चौथाई लोगों ने भी इन भारतीय सितारों के पोस्‍टर्स आदि खरीदने में रूचि नहीं दिखाई. इसकी तुलना में इस वर्ष जुलाई में पूर्वी भारत के महानगरों में पेप्‍सी कंपनी ने मानचेस्‍टर युनाईटिड की सिंगापुर और थाइलैंड यात्रा को प्रोत्‍साहित करने के लिये समारोह आयोजित किये तो वहां दर्शकों का सैलाब उमड़ पड़ा. यहीं नहीं उन्‍होंने इन समारोह में क्विज प्रतियोगिताएं भी रखी जिनके भाग्‍यशाली विजेताओं को थाइलैंड और सिंगापुर की यात्रा कर अपने मनपंसद खिलाडि़यो के सा‍थ फोटो सैशन करवाने का मौका भी दिया गया. इस प्रतियोगिता पर खेल प्रेमी टूट पड़े और जो जीत गये उन्‍हें तो मानो कुबेर का खजाना मिल गया और जो हार गये वो बुरी तरह हताश हो गये. उधर इंग्लिश प्रीमियर लीग और स्‍पेनिश लीग के प्रसारण अधिकार प्राप्‍त कर ई एस पी एन और स्‍टार स्‍पोर्ट्स फूले नहीं समाते. इस खेल चैनल के प्रबंध निदेशक राइक डोवे कहते हैं ‘’हमें इन खेलों के प्रसारण अधिकार मिलने से चांदी ही चांदी हैं. हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह उत्‍साह ज्‍यादा समय तक बरकरार नहीं रह सकता. मियों वे कहते हैं कि आज क्रिकेट की अधिकता के कारण लोग ऊब कर फुटबाल की ओर रुख कर रहे हैं किंतु धोनी और पठान जैसे युवा क्रिकेट खिलाडि़यों ने भारतीय क्रिकेट में नया जोश भरा है और हो सकता है कि आने वाले समय में भारतीय क्रिकेट के प्रति लोगों का आकर्षण पहले से भी बढ़ जाए. अंतराष्‍ट्रीय फुटबाल चाहे कितना भी रोमांचक क्‍यों न हो, मगर इसमें वो अपनापन नहीं हैं जो क्रिकेट में हैं. अपना देश आखिर अपना देश होता हैं. वैसे भारत की फुटबॉल टीम भी कहीं बेहतर प्रदर्शन करने का माद्दा रखती हैं. ये बात और है कि किसी भी प्रकार की उम्‍मीद नहीं हैं. और यदि खेल प्रेमी यह जानते हैं कि भारत 1951 और 1962 में फुटबाल कीएशियाई चैंपियनशिप जीत चुका है तो उन्‍होंने राष्‍ट्रीय फुटबाल टीम के वर्तमान प्रदर्शन को देखकर और भी निराशा होगी. खेल प्रेका कहना हैं ‘हम भारतीय फुटबाल खिलाडि़यों के साथ तस्‍वीरें क्‍यों खिंचवाएं, हमारी नजर में वे सितारे नहीं हैं’’. भारतीय खेल प्रेमियों को स्‍तरीय मैच देखने में मजा आ रहा हैं तो वो इस बात की परवाह क्‍यों करें कि खिला‍ड़ी कौन से देश के हैं.
कृपया इस सार का मूल्यांकन करें : 1 2 3 4 5


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टिप्पणियाँ

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  1. sachin

    sachin

    14 अक्तूबर 2006

    i read yr article - this is good .. i need to talk to u pls mail me if possible thnsx

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